Wednesday, 23 March 2016

भगत सिंह का पत्र सुखदेव के नाम- (1929)




" भगत सिंह लाहौर के नेशनल कॉलेज के छात्र थे। एक सुंदर-सी लड़की आते जाते उन्हें देखकर मुस्कुरा देती थी और सिर्फ भगत सिंह की वजह से वह भी क्रांतिकारी दल के करीब आ गयी। जब असेंबली में बम फेंकने की योजना बन रही थी तो भगत सिंह को दल की जरूरत बताकर साथियों ने उन्हें यह जिम्मेदारी सौपने से इंकार कर दिया। भगत सिंह के अंतरंग मित्र सुखदेव ने उन्हें ताना मारा कि तुम मरने से डरते हो और ऐसा उस लड़की की वजह से है। इस आरोप से भगत सिंह का हृदय रो उठा और उन्होंने दोबारा दल की मीटिंग बुलाई और असेंबली में बम फेंकने का जिम्मा जोर देकर अपने नाम करवाया। आठ अप्रैल, 1929 को असेंबली में बम फेंकने से पहले सम्भवतः 5 अप्रैल को दिल्ली के सीताराम बाजार के घर में उन्होंने सुखदेव को यह पत्र लिखा था जिसे शिव वर्मा ने उन तक पहुँचाया। यह 13 अप्रैल को सुखदेव के गिरफ़्तारी के वक्त उनके पास से बरामद किया गया और लाहौर षड्यंत्र केस में सबूत के तौर पर पेश किया गया।


प्रिय भाई,

जैसे ही यह पत्र तुम्हे मिलेगा, मैं जा चुका होगा-दूर एक मंजिल की तरफ। मैं तुम्हें विश्वास दिलाना चाहता हूं कि आज बहुत खुश हूं। हमेशा से ज्यादा। मैं यात्रा के लिए तैयार हूं, अनेक-अनेक मधुर स्मृतियों के होते और अपने जीवन की सब खुशियों के होते भी, एक बात जो मेरे मन में चुभ रही थी कि मेरे भाई, मेरे अपने भाई ने मुझे गलत समझा और मुझ पर बहुत ही गंभीर आरोप लगाए- कमजोरी का। आज मैं पूरी तरह संतुष्ट हूं। पहले से कहीं अधिक। आज मैं महसूस करता हूं कि वह बात कुछ भी नहीं थी, एक गलतफहमी थी। मेरे खुले व्यवहार को मेरा बातूनीपन समझा गया और मेरी आत्मस्वीकृति को मेरी कमजोरी। मैं कमजोर नहीं हूं। अपनों में से किसी से भी कमजोर नहीं।

भाई! मैं साफ दिल से विदा होऊंगा। क्या तुम भी साफ होगे? यह तुम्हारी बड़ी दयालुता होगी, लेकिन ख्याल रखना कि तुम्हें जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहिए। गंभीरता और शांति से तुम्हें काम को आगे बढ़ाना है, जल्दबाजी में मौका पा लेने का प्रयत्न न करना। जनता के प्रति तुम्हारा कुछ कर्तव्य है, उसे निभाते हुए काम को निरंतर सावधानी से करते रहना।

सलाह के तौर पर मैं कहना चाहूँगा की शास्त्री मुझे पहले से ज्यादा अच्छे लग रहे हैं। मैं उन्हें मैदान में लाने की कोशिश करूँगा,बशर्ते की वे स्वेच्छा से, और साफ़ साफ़ बात यह है की निश्चित रूप से, एक अँधेरे भविष्य के प्रति समर्पित होने को तैयार हों। उन्हें दूसरे लोगों के साथ मिलने दो और उनके हाव-भाव का अध्यन्न होने दो। यदि वे ठीक भावना से अपना काम करेंगे तो उपयोगी और बहुत मूल्यवान सिद्ध होंगे। लेकिन जल्दी न करना। तुम स्वयं अच्छे निर्णायक होगे। जैसी सुविधा हो, वैसी व्यवस्था करना। आओ भाई, अब हम बहुत खुश हो लें।

खुशी के वातावरण में मैं कह सकता हूं कि जिस प्रश्न पर हमारी बहस है, उसमें अपना पक्ष लिए बिना नहीं रह सकता। मैं पूरे जोर से कहता हूं कि मैं आशाओं और आकांक्षाओं से भरपूर हूं और जीवन की आनंदमयी रंगीनियों ओत-प्रोत हूं, पर आवश्यकता के वक्त सब कुछ कुर्बान कर सकता हूं और यही वास्तविक बलिदान है। ये चीजें कभी मनुष्य के रास्ते में रुकावट नहीं बन सकतीं, बशर्ते कि वह मनुष्य हो। निकट भविष्य में ही तुम्हें प्रत्यक्ष प्रमाण मिल जाएगा।

किसी व्यक्ति के चरित्र के बारे में बातचीत करते हुए एक बात सोचनी चाहिए कि क्या प्यार कभी किसी मनुष्य के लिए सहायक सिद्ध हुआ है? मैं आज इस प्रश्न का उत्तर देता हूँ – हाँ, यह मेजिनी था। तुमने अवश्य ही पढ़ा होगा की अपनी पहली विद्रोही असफलता, मन को कुचल डालने वाली हार, मरे हुए साथियों की याद वह बर्दाश्त नहीं कर सकता था। वह पागल हो जाता या आत्महत्या कर लेता, लेकिन अपनी प्रेमिका के एक ही पत्र से वह, यही नहीं कि किसी एक से मजबूत हो गया, बल्कि सबसे अधिक मजबूत हो गया।

जहां तक प्यार के नैतिक स्तर का संबंध है, मैं यह कह सकता हूं कि यह अपने में कुछ नहीं है, सिवाए एक आवेग के, लेकिन यह पाशविक वृत्ति नहीं, एक मानवीय अत्यंत मधुर भावना है। प्यार अपने आप में कभी भी पाशविक वृत्ति नहीं है। प्यार तो हमेशा मनुष्य के चरित्र को ऊपर उठाता है। सच्चा प्यार कभी भी गढ़ा नहीं जा सकता। वह अपने ही मार्ग से आता है, लेकिन कोई नहीं कह सकता कि कब?

हाँ, मैं यह कह सकता हूँ कि एक युवक और एक युवती आपस में प्यार कर सकते हैं और वे अपने प्यार के सहारे अपने आवेगों से ऊपर उठ सकते हैं, अपनी पवित्रता बनाये रख सकते हैं। मैं यहाँ एक बात साफ़ कर देना चाहता हूँ की जब मैंने कहा था की प्यार इंसानी कमजोरी है, तो यह एक साधारण आदमी के लिए नहीं कहा था, जिस स्तर पर कि आम आदमी होते हैं। वह एक अत्यंत आदर्श स्थिति है, जहाँ मनुष्य प्यार-घृणा आदि के आवेगों पर काबू पा लेगा, जब मनुष्य अपने कार्यों का आधार आत्मा के निर्देश को बना लेगा, लेकिन आधुनिक समय में यह कोई बुराई नहीं है, बल्कि मनुष्य के लिए अच्छा और लाभदायक है। मैंने एक आदमी के एक आदमी से प्यार की निंदा की है, पर वह भी एक आदर्श स्तर पर। इसके होते हुए भी मनुष्य में प्यार की गहरी भावना होनी चाहिए, जिसे की वह एक ही आदमी में सिमित न कर दे बल्कि विश्वमय रखे।

मैं सोचता हूँ,मैंने अपनी स्थिति अब स्पष्ट कर दी है.एक बात मैं तुम्हे बताना चाहता हूँ की क्रांतिकारी विचारों के होते हुए हम नैतिकता के सम्बन्ध में आर्यसमाजी ढंग की कट्टर धारणा नहीं अपना सकते। हम बढ़-चढ़ कर बात कर सकते हैं और इसे आसानी से छिपा सकते हैं, पर असल जिंदगी में हम झट थर-थर कांपना शुरू कर देते हैं।

मैं तुम्हे कहूँगा की यह छोड़ दो। क्या मैं अपने मन में बिना किसी गलत अंदाज के गहरी नम्रता के साथ निवेदन कर सकता हूँ की तुममे जो अति आदर्शवाद है, उसे जरा कम कर दो। और उनकी तरह से तीखे न रहो, जो पीछे रहेंगे और मेरे जैसी बिमारी का शिकार होंगे। उनकी भर्त्सना कर उनके दुखों-तकलीफों को न बढ़ाना। उन्हें तुम्हारी सहानभूति की आवशयकता है।

क्या मैं यह आशा कर सकता हूं कि किसी खास व्यक्ति से द्वेष रखे बिना तुम उनके साथ हमदर्दी करोगे, जिन्हें इसकी सबसे अधिक जरूरत है? लेकिन तुम तब तक इन बातों को नहीं समझ सकते जब तक तुम स्वयं उस चीज का शिकार न बनो। मैं यह सब क्यों लिख रहा हूं? मैं बिल्कुल स्पष्ट होना चाहता था। मैंने अपना दिल साफ कर दिया है।

तुम्हारी हर सफलता और प्रसन्न जीवन की कामना सहित,

तुम्हारा भाई
भगत सिंह


Thursday, 17 March 2016

वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है/दुष्यन्त कुमार ( साये में धूप)

वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है,
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है ।
वे कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू,
मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है ।
सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर,
झोले में उसके पास कोई संविधान है ।
उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप,
वो आदमी नया है मगर सावधान है ।
फिसले जो इस जगह तो लुढ़कते चले गए,
हमको पता नहीं था की इतना ढलान है ।
देखे हैं हमने दौर कई अब खबर नहीं ,
पाँवों तले ज़मीन है या आसमान है ।
वो आदमी मिला था मुझे उसकी बात से 
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बेज़ुबान है ।
―दुष्यन्त कुमार ( साये में धूप)

Tuesday, 15 March 2016

अमृता प्रीतम , उपन्यास ' यह सच है'

आज और कल में गरीबी का वह एक लम्बा फ़ासला होता है जो कई बार एक जन्म में तय नहीं होता ।
पर समझ की हद में आकर भी कई बातें ऐसी होती हैँ जो समझ से परे खड़ी रहती हैं ।
घर बदल सकते हैं, पर इससे क्या होता है। कहीं भी जाओ, वही घरो के कोने होते हैं, और कोनो के अंधेरे और अंधेरो में लटकने वाले सवाल....
कई बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें शब्दों की सज़ा नहीं देनी चाहिए । देखा जाय तो यह धरती मजबूरियों का एक लम्हा इतिहास है।
दुर्योधन की भरी सभा में द्रौपदी ने पूछा था कि युधिष्ठिर जब स्वयं को हार चुके, तब मुझे दांव लगाने का उन्हें क्या अधिकार था ? और यह सवाल हज़ारो वर्षो से हवा में खड़ा हुआ है ।
एतराज का सम्बन्ध क़ानून से होता है, संकोच का मन से ।
यह युग का अंतर है ― आज की मुहब्बत को कोई हवनकुंड नहीं कहता.. आज के राक्षसों को कोई राक्षस नहीं कहता.. आज की भलाई को कोई वरदान नहीं कहता.. आज की बुराई को कोई श्राप नहीं कहता ।
ख़ामोशी का दोष बहुत बड़ा और दूर तक फैला हुआ है, इन्सान के बिस्तर से लेकर दुनिया के राजसिंहासन तक ....
कई सवाल सदियों से हवा में खड़े हुए हैँ, पर इन्सान सदियों से चुप है ।
इन गलत राहों पर चलने के लिए इन्सान को हिम्मत नहीं चाहिए, इन पर न चलने के लिए हिम्मत चाहिए ।
अगर भगवान पत्थर का बनाया जा सकता है, तो इन्साफ़ क्यों नहीं ! बल्कि वही तो सच होगा जीभ सिर्फ हुकूमतों की होती है, इन्सान तो कब का चुप है ।
― अमृता प्रीतम , उपन्यास ' यह सच है' से

Friday, 29 January 2016

कहाँ क़ातिल बदलते हैं फ़क़त चेहरे बदलते हैं/हबीब जालिब

कहाँ क़ातिल बदलते हैं फ़क़त चेहरे बदलते हैं
अजब अपना सफ़र है फ़ासले भी साथ चलते हैं

बहुत कमजर्फ़ था जो महफ़िलों को कर गया वीराँ
न पूछो हाले चाराँ शाम को जब साए ढलते हैं

वो जिसकी रोशनी कच्चे घरों तक भी पहुँचती है
न वो सूरज निकलता है, न अपने दिन बदलते हैं                                              

कहाँ तक दोस्तों की बेदिली का हम करें मातम
चलो इस बार भी हम ही सरे मक़तल निकलते हैं

हमेशा औज पर देखा मुक़द्दर उन अदीबों का
जो इब्नुलवक़्त होते हैं हवा के साथ चलते हैं

हम अहले दर्द ने ये राज़ आखिर पा लिया ‘जालिब’
कि दीप ऊँचे मकानों में हमारे खूँ से जलते हैं
-- हबीब जालिब 



मक़तल=क़त्लगाह की तरफ़
इब्नुलवक़्त=मौक़ापरस्त

Wednesday, 27 January 2016

ये ठीक है कि तेरी गली में न आयें हम/हबीब जालिब

ये ठीक है कि तेरी गली में न आयें हम.
लेकिन ये क्या कि शहर तेरा छोड़ जाएँ हम.

मुद्दत हुई है कूए बुताँ की तरफ़ गए,
आवारगी से दिल को कहाँ तक बचाएँ हम.

शायद बकैदे-जीस्त ये साअत न आ सके
तुम दास्ताने-शौक़ सुनो और सुनाएँ हम.

उसके बगैर आज बहोत जी उदास है,
'जालिब' चलो कहीं से उसे ढूँढ लायें हम

----हबीब जालिब 

Tuesday, 26 January 2016

मेरा जन्मदिन .....

25 जनवरी सन् 1989 को हम इस दुनिया में सुबह 8 बजकर 15 मिनट पर पधारे, घर क्या खानदान में सबसे छोटा भाई हूँ सो अब तक इसी गफलत में रहता हूँ कि यार अभी तो बच्चा हूँ , लेकिन जिंदगी गफलत में रहे है ये भी तो अच्छा नही है परिवार और लँगोटिया यार तो साथ है ही लेकिन आप सब फ़ेसबुक के यार भी कम नही है जब से ब्लॉगर पे अड्डा बनाया है तब से कई यार मिले है वो हमउम्र भी है और कुछ उम्र से बड़े भी , लेकिन यारी मस्त है दोस्तों !! आपकी डांट , आपका प्यार हमेशा साथ रहे यही कामना है आप सबका तहेदिल से धन्यवाद जो इस जन्मदिन पर बधाई भेजी हैं आपका प्यार और सलीका सर आँखों पर !!!


आपका प्यारा निशान्त यादव

Friday, 15 January 2016

रोको मत , मुझे आने दो...



 रोको मत , मुझे आने दो
तुम अकेले नहीं हो इस सफ़र में
पीछे मुड के सुनना
मेरे कदमो की आहट भी होगी
तुम चलो रुको मत
मुझे भी तो आने दो
तुम जब थक जाओगे , निढाल हो जाओगे
तब मेरे कदम तुम्हारे साथ होंगे
कोई रहमो करम न सही
मुझे मेरा कर्म निभाने दो
तुम नदी से अविरल हो
मगर कभी सूखे तो
मुझे उसमे मिल जाने दो
रोको मत , मुझे आने दो
कुछ आएंगी सुनी राहें
घोर अँधेरी संकरी राहें
मुझको दीपक बन जाने दो
रोको मत , मुझे आने दो
मोड़ कई आएंगे ,तुमको शायद  भरमाएंगे
मुझको सूचक बन जाने दो
रोको मत , मुझे आने दो
       
        -----निशान्त यादव

Saturday, 26 December 2015

ओ हुस्ना मेरी, यादों पुरानी में खोया



लाहौर के उस पहले जिले के,
दो परगना में पहुंचे,
रेशम गली के दूजे कूचे के,
चौथे मकां में पहुंचे,
कहते हैं जिसको दूजा मुल्क,
उस पाकिस्तान में पहुंचे,
लिखता हूं खत मैं हिंदुस्तां से
पहलु-ए-हुस्ना में पहुंचे,
ओ हुस्ना…
मैं तो हूं बैठा,
ओ हुस्ना मेरी, यादों पुरानी में खोया,
पल पल को गिनता
पल पल को चुनता
बीती कहानी में खोया
पत्ते जब झड़ते हिंदुस्तां में
बातें तुम्हारी ये बोलें
होता उजाला जब हिंदुस्तां में
यादें तुम्हारी ये बोलें
ओ हुस्ना मेरी ये तो बता दो
होता है ऐसा क्या उस गुलिस्तां में
रहती हो नन्ही कबूतर सी गुम तुम जहां
ओ हुस्ना…
पत्ते क्या झड़ते हैं पाकिस्तान में वैसे ही
जैसे झड़ते यहां
ओ हुस्ना…
होता उजाला क्या वैसा ही है
जैसा होता है हिंदुस्तां में…हां
ओ हुस्ना…
वो हीर के रांझों, के नगमें मुझको
हर पल आ आके सताएं
वो बुल्ले शाह की तकरीरों के
झीने झीने से साये
वो ईद की ईदी, लंबी नमाजें, सेवइयों की झालर
वो दीवाली के दिये, संग में बैसाखी के बादल
होली की वो लकड़ी जिसमें
संग संग आंच लगायी
लोहड़ी का वो धुंआ जिसमें
धड़कन है सुलगायी
ओ हुस्ना मेरी
ये तो बता दो
लोहड़ी का धुआं क्या अब भी निकलता है
जैसे निकलता था, उस दौर में हां… वहां
ओ हुस्ना
हीरों के रांझों के नगमे
क्या अब भी सुने जाते हैं वहां
ओ हुस्ना
रोता है रातों में पाकिस्तान क्या वैसे ही
जैसे हिंदुस्तान
ओ हुस्ना
पत्ते क्या झड़ते हैं क्या वैसे ही
जैसे कि झड़ते यहां
होता उजाला क्या वैसे ही
जैसा होता ही हिंदुस्तां में… हां

ओ हुस्ना…



Friday, 18 December 2015

मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको /अदम गोंडवी



अदम गोंडवी , मूल नाम रामनाथ सिंह , आज अदम गोंडवी साहव की पुण्यतिथि है गोंडवी साहब ने  अपनी कविताओं में हिंदुस्तान के गांव  देहात के दर्द  , देश की शोषकवादी राजनीती , सामंतवाद , पूंजीबाद , जातिगत छुआछूत पर प्रहार करती हुई कवितायेँ लिखी .. उनकी लिखी कविता जो आज भी एक दम जस की तस है जिसे अक्सर लोग राजनीती पर कटाक्ष के रूप में इस्तेमाल करते है
"काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में"

गोंडवी साहब जैसा धारदार लेखन कहीं नहीं मिलता , मैं आज के दिन उनकी कुछ कवितायेँ शेयर कर रह रहा हूँ ..
1:
आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी एक कुएँ में डूब कर

है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा

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2:
जो उलझ कर रह गई है फाइलों के जाल में
गाँव तक वो रोशनी आएगी कितने साल में

बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गई
रमसुधी की झोपड़ी सरपंच की चौपाल में

खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गए
हमको पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में

जिसकी क़ीमत कुछ न हो इस भीड़ के माहौल में
ऐसा सिक्का ढालिए मत जिस्म की टकसाल में

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3:
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है

उधर जम्हूरियत का ढोल पीते जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है

लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है

तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है


                                                                       निशान्त यादव ..

Thursday, 10 December 2015

दुनिया मेरी भैंस / रमाशंकर यादव 'विद्रोही'




अभी तीन चार दिन फेसबुक से दूरी रही .. लौटते ही पता चला  रमाशंकर यादव 'विद्रोही' नहीं रहे है मैं सच कहूँ तो  विद्रोही जी को आज से पहले मैने कभी नहीं जाना , काफी कुछ तो यहाँ फेसबुक से  पता चला बाकि और ढूंढा तब कविता कोष पर उनकी लिखी कवितायेँ मिली .. एक डॉक्यूमेंट्री भी मिली ... जेएनयू से उनका लगाव और समाज के खोखलेपन को तार-तार करती उनकी कवितायेँ दिलोदिमाग पर छा गई है सोचता हूँ मैं अभागा ही था जो उनसे मिल न पाया .... उनकी लिखी ये कविता पोस्ट करते हुए उन्हें श्रदांजलि अर्पित करता हूँ ..

मैं अहीर हूँ
और ये दुनिया मेरी भैंस है
मैं उसे दुह रहा हूँ
और कुछ लोग कुदा रहे हैं
ये कउन (कौन) लोग हैं जो कुदा रहे हैं ?
आपको पता है.
क्यों कुदा रहे हैं?
ये भी पता है.
लेकिन एक बात का पता
न हमको है न आपको न उनको
कि इस कुदाने का क्या परिणाम होगा
हाँ ...इतना तो मालूम है
कि नुकसान तो हर हाल में खैर
हमारा ही होगा
क्योंकि भैंस हमारी है
दुनिया हमारी है!


                                                                                  कविता साभार http://kavitakosh.org/

Wednesday, 25 November 2015

सूरज संग दिहाड़ी





यहाँ इस दिशा में सूर्य रोज आकर छिप जाते है आठवें माले पर ऑफिस की खिड़की मैरे और सूर्य के बीच संवाद के  माध्यम का काम करती है ये जनाव कभी इस मोवाइल टाबर पर लटक जाते है तो कभी इसकी ऊपर की मंजिल पर चढ़ कर मुझे आवाज देते है

चल भाई ! आज की दिहाड़ी पूरी हुई , कल भी आना है

मैं कहता हूँ  रुको यार अभी काम बाकि है लेकिन ये जनाव नियम के पक्के है टाइम पे निकल लेते है और उधर से मुझे काम में खपते हुए देख कर खूब दांत चियारते है और इतना जोर से हँसते है की बादल  भी इनकी हंसी से गुलजार रहता है देखो हँसते हँसते बादल लाल हो गया है नीचे आदम की बनाई हुई मंजिलो पर लट्टू रोशन है

सड़क पर दौड़ती गाड़ियां आठवें माले से अँधेरी रात में उड़ते जुगनू सी नजर आती है  सूर्य के जाने के बाद इन्हे ही देख कर थोड़ा होंसला पा लेता हूँ  , चलो अभी तो शहर जग रहा है मेरा हाल बादशाह अकबर के उस दरबारी सा जो किले के कंडील से थोड़ी गर्माहट लेते हुए रात भर पानी में खड़ा रहता है मैं इस बेहोशी में होश लिए रहता हूँ इतने में बिल्डिंग का चौकीदार आता है साहब चलिए आठ बजे के बाद यहाँ रुकना अलाउ नहीं है बैसे  ये चौकीदार आठवीं पास है लेकिन शहर की आवोहवा  इसे अंग्रेजी भी सिखा गई है मैं थोड़ी ठिठोली करते कहता हूँ क्या भाई अंग्रेजी सीख ली , चौकीदार थोड़ा खुश होकर कहता है साहब सब आप पढ़े लिखों की संगत है पिता के उम्र के इस चौकीदार से मुझे पिता जी की वो सीख याद आजाती है जो वे यहाँ आने से पहले हरबार देते है बेटा गलत संगत से दूर रहना ..

कार्तिक के महीने में रात भी निगोड़ी घिर जाने को तैयार बैठी रहती है देखो अब घिर आई है सामने वाली अस्पताल की बिल्डिंग पर जलती  दिवाली की झालर अब तक इस रात से लड़ रही है जिस टाबर पर सूर्य लटकर कर हिलोरे लेते है ये सो गया है बस इसने अब सूर्य की जगह अपने सिरहाने लाल लट्टू जला लिया .. ताकि आसमान में उड़ते जहाज इसके होने का अहसास लेते रहे है शहर की जिंदगी इस टाबर सी है सोते हुए भी जगते रहना है यहाँ सोते है खुद के लिए और जगते है दूसरों के लिए ..

खैर  इस कभी न खत्म होने वाली कल्पना से बाहर निकलते है और चलते है अपने आशियाने की तरफ .. वर्ना चौकीदार फिर से आजायेगा और डिसअलाउ कह देगा ..  सुबह सूरज भाई भी आते हैं अपनी रौशनी का हंटर लिए और जोर से चिल्लाते है चल शुरू करें दिहाड़ी यारा .. अपना और सूरज का साथ ऐसा ही है ..


                                                                                                      .....निशान्त यादव

Wednesday, 18 November 2015

जो तुम उदास नज्म लिखोगे






कोई नहीं होगा ,अकेले होगे
ढलता सूरज होगा  ,घिरती रात होगी                                             
जब तुम तनहा होगे
ये सब गिरहे तुम्हारे साथ होंगी

कोई उदास नज्म लिखोगे
उसका जाना , कहीं दूर से दिखना
खुद कहीं  ठहर कर बैठ जाना
सिगरेट के धुएं में यादों का उड़ जाना ..
या उनका धुएं में अक्स दिख जाना

उस पर लिखी नज्म फिर  पढोगे
पन्ने पर रखे गुलाब को फिर छुओगे
कहो कैसे भुलाओगे
जो तुम उदास नज्म लिखोगे

पार्क की खाली कुर्सी  पे अकेले होना
कहीं समंदर में पैरो से बहते पानी को छूना
खुद का वहीँ ठहर जाना
आईने में खुद के पीछे उसे देखना
जो मुड़े तो उसका गायव  हो जाना
कहो कैसे भुलाओगे
जो तुम उदास नज्म लिखोगे
                                                         .
                                                     .निशान्त यादव