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Saturday, 14 February 2015

नयी सरकार नयी उम्मीदें - Congratulation Arvind kejriwal


दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने केलिए  अरविन्द केजरीवाल को बधाई | आज उन्होंने औपचारिक शपथ लेकर इसे पूर्ण किया , रामलीला मैदान तमाम ऐतिहासिक घटनाओ का गवाह रहा है और आज फिर से  इतिहास को इसी मैदान में दोहराया , आज अरविन्द केजरीवाल ने  जिस सकारात्मक राजनीती की झलक दिखाई उस से उम्मीदें जगी है उन्होंने सबसे पहले सत्ता के अहंकार से चेताया क्योकि सत्ता या किसी पद के मिल जाने पर अपने आप को  बनायें रखना कठिन होता है |  खेर इसका फैसला भी बक्त करेगा , आज उन्होंने जो सबसे मुख्य  बात कही जो बाकई सकारात्मक राजनीती का पहला कदम है  सबको साथ लेकर चलने की बात | आज उन्होंने अपने साथ बीजेपी के तीन बिधायको को भी अपना ही बताया , उन्होंने अपने बिपक्षी , किरण वेदी , अजय माकन के अनुभवों की  सेवा लेने की बात भी कही और ये बड़ी सकारात्मक  पहल है कोई व्यक्ति देश के किसी संबैधानिक पद पर बैठने के बाद पूरे देश का या प्रदेश का होता है और यह बात अन्य पार्टी और नेताओं को अरविन्द केजरीवाल  से सीखनी चाहिए , अरविन्द केजरीवाल ने जो भाषण आज दिया उसका निचोड़ यही रहा  की वो दिल्ली को बदल देना चाहते और वो भी सबको  साथ लेकर ,सबके अनुभवों को साथ लेकर | उनके अंदर आज मुझे एक ऐसा व्यक्ति नजर आया जो सबकुछ ठीक कर देना चाहता है  मुझे उम्मीद है ये सकारात्मकता आम आदमी पार्टी के प्रसार को और बढ़ाएगी  अंततः आज का दिन ऐतिहासिक और आशाओ भरा रहा , में अरविन्द केजरीवाल , उनके मंत्रिओं , विधायको , दिल्ली की महान जनता को बधाई देता हूँ और उम्मीद करता हूँ नयी सरकार अच्छा काम करेगी , अन्यथा हम तो जनता है "गड़बड़ हुई तो फिर से कोई और सरकार"

निशांत यादव 

Saturday, 17 January 2015

जन आंदोलनों का राजनैतिक अंत -Movement Dead on Politics


वो दिन मेरे जेहन में आज भी जिन्दा है जब रामलीला मैदान में अन्ना हजारे अपने बजीरो के साथ देश की तत्कालीन सरकार के खिलाफ हुंकार भर रहे है थे उस समय तमाम राजनैतिक विपक्षी अन्ना के समर्थन में आ खड़े हुए और उस समय अन्ना जी का साफ आदेश था , कोई राजनैतिक आदमी मंच पर नहीं चढ़ने पाये | उनके इस आदेश की तामील करने वाली किरण वेदी जी थी , उन्होंने उस समय के तमाम राजनैतिक लोगो से कठिन सवाल पूछे और उन पर तेज हमले भी किये उन्होंने उन्ही मोदी से दंगे का कभी न माफ़ करने वाला सवाल पुछा तो जिन अरुण जेटली जी के उपस्थिति बीजेपी की सदस्य्ता ली , उन पर भी आरोप लगाये , अन्ना आंदोलन के दो धुरी थे किरण वेदी और अरविन्द केजरीवाल , केजरीवाल तो पहले ही राजनीती में आ चुके है और कहीं न कहीं उन्होंने इस देश में एक नयी राजनीती की सोच को जीवित किया है और उसका असर ही एक आज बीजेपी को नरेंद्र मोदी की अच्छी छवि के बाबजूद किरण वेदी को लाना पड़ा . वार्ना किरण वेदी जैसी  कड़क महिला को बीजेपी क्या कोई भी राजनैतिक पार्टी शामिल करना नहीं चाहेगी , किरण वेदी की अपनी एक शैली है और मुझे उम्मीद है बो अब भी उस शैली पर  कायम रहेगी | भारत में जो भी बड़े जन आंदोलन हुए है जो सरकारों की निरंकुशता के खिलाफ खड़े हुए उनका अंत राजनैतिक ही हुआ , वे जिस गन्दी राजनीती के खिलाफ खड़े हुए , अंत में उस आंदोलन  सेनापति को दरनिकार करते हुए उसके सिपाही भी उसी गन्दी राजनीती में जा मिले जिसको उन्होंने कथित रूप से गन्दा वताया ,  इतिहास गवाह है जेपी आंदोलन से निकले बिहार के नेता हो या उत्तर प्रदेश के नेता सभी जातिवाद , सम्प्रदायवाद , भ्रष्टाचार के  गलियारों से होते सत्तासीन हुए , हमने तब भी एक अच्छी राजनीती की शुरुआत की उम्मीद की थी  , लेकिन समय साथ हमारी उम्मीदें टूटती गयीं और फिर उसी आंदोलन के क्रांतिकारिओं से त्रस्त होकर फिर एक नयी आशा के रूप अन्ना आंदोलन का साथ दिया , और एक जनलोकपाल की मांग की , हालांकि  हम में से तमाम आशावादीलोगो को   जनलोकपाल के बारीक़ फायदे के वारे में नहीं पता था , बस इतना था ये शब्द हमें कुछ राहत देगा , लेकिन अंतता इस आशा का राजनैतिक अंत  ही हुआ , एक सुखद ये रहा इस आंदोलन के सिपाही ने एक नयी तरह की राजनीती की शुरुआत  की , और उसी कड़ी का एक हिस्सा है किरण वेदी का बीजेपी में शामिल होना , ये बड़ी सही शुरुआत  है किरण वेदी यदि बीजेपी की मुख्यमंत्री बनती है और उनकी शैली भी बही १९८४ हो या इंद्रा गांधी की कार पार्किंग का मामला हो , तो फिर जरूर कुछ सही हो जायेगा , लेकिन मुझे इसकी उम्मीद बड़ी क्षीण लगती है क्यों की किरण वेदी चर्चित जरूर है लेकिन उनके पास जनाधार नहीं , और जिन नेताओं के पास जनाधार है बो किरण वेदी के आने से बैकफुट में आगये है हालाकिं अभी वे भले ही ही ही करते हो लेकिन कहीं न कहीं ये चुभन उनके ह्रदय में रहेगी , और मुझे ऐसा शक है किरण वेदी इसी गुटबाजी का शिकार हो जायेगीं , किरण अमित शाह और बीजेपी के पाश में फंस गयीं , बीजेपी ने धीरे इस लड़ाई को मोदी वनाम केजरीवाल से , वेदी वनाम केजरीवाल कर दिया है , वेदी जीती तो बीजेपी और मोदी  की जय  , यदि वो हारी तो फिर वेदी की हार ,और यदि वे कथित राजनीति से समझोता क़र  लेती है तब फिर इस देश में लोगो आंदोलनों के विश्वास उठ जायेगा , शायद फिर कोई जेपी , अन्ना , किरण , या केजरीवाल नहीं होंगे , ..........