वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है,
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है ।
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है ।
वे कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू,
मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है ।
मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है ।
सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर,
झोले में उसके पास कोई संविधान है ।
झोले में उसके पास कोई संविधान है ।
उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप,
वो आदमी नया है मगर सावधान है ।
वो आदमी नया है मगर सावधान है ।
फिसले जो इस जगह तो लुढ़कते चले गए,
हमको पता नहीं था की इतना ढलान है ।
हमको पता नहीं था की इतना ढलान है ।
देखे हैं हमने दौर कई अब खबर नहीं ,
पाँवों तले ज़मीन है या आसमान है ।
पाँवों तले ज़मीन है या आसमान है ।
वो आदमी मिला था मुझे उसकी बात से
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बेज़ुबान है ।
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बेज़ुबान है ।
―दुष्यन्त कुमार ( साये में धूप)
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