Tuesday, 15 March 2016

अमृता प्रीतम , उपन्यास ' यह सच है'

आज और कल में गरीबी का वह एक लम्बा फ़ासला होता है जो कई बार एक जन्म में तय नहीं होता ।
पर समझ की हद में आकर भी कई बातें ऐसी होती हैँ जो समझ से परे खड़ी रहती हैं ।
घर बदल सकते हैं, पर इससे क्या होता है। कहीं भी जाओ, वही घरो के कोने होते हैं, और कोनो के अंधेरे और अंधेरो में लटकने वाले सवाल....
कई बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें शब्दों की सज़ा नहीं देनी चाहिए । देखा जाय तो यह धरती मजबूरियों का एक लम्हा इतिहास है।
दुर्योधन की भरी सभा में द्रौपदी ने पूछा था कि युधिष्ठिर जब स्वयं को हार चुके, तब मुझे दांव लगाने का उन्हें क्या अधिकार था ? और यह सवाल हज़ारो वर्षो से हवा में खड़ा हुआ है ।
एतराज का सम्बन्ध क़ानून से होता है, संकोच का मन से ।
यह युग का अंतर है ― आज की मुहब्बत को कोई हवनकुंड नहीं कहता.. आज के राक्षसों को कोई राक्षस नहीं कहता.. आज की भलाई को कोई वरदान नहीं कहता.. आज की बुराई को कोई श्राप नहीं कहता ।
ख़ामोशी का दोष बहुत बड़ा और दूर तक फैला हुआ है, इन्सान के बिस्तर से लेकर दुनिया के राजसिंहासन तक ....
कई सवाल सदियों से हवा में खड़े हुए हैँ, पर इन्सान सदियों से चुप है ।
इन गलत राहों पर चलने के लिए इन्सान को हिम्मत नहीं चाहिए, इन पर न चलने के लिए हिम्मत चाहिए ।
अगर भगवान पत्थर का बनाया जा सकता है, तो इन्साफ़ क्यों नहीं ! बल्कि वही तो सच होगा जीभ सिर्फ हुकूमतों की होती है, इन्सान तो कब का चुप है ।
― अमृता प्रीतम , उपन्यास ' यह सच है' से

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