Sunday, 25 October 2015

तुम अपना रंजो गम अपनी परेशानी मुझे दे दो 

तुम अपना रंजो गम अपनी परेशानी मुझे दे दो 

तुम्हे उनकी कसम इस दिल की वीरानी मुझे दे दो ।

ये माना मैं किसी काबिल नहीं हूँ इन निगाहों मे

बुरा  क्या है अगर ये दुःख ये हैरानी  मुझे दे दो ।

मैं देखूं तो सही दुनिया तुम्हे  कैसे सताती है 

कोई दिन के लिए अपनी निगेहबानी  मुझे दे दो ।

वो दिल जो  मैंने माँगा था मगर गैरों ने पाया था  

बड़ी शै है अगर उसकी पशेमानी मुझे दे दो ।

Friday, 23 October 2015

चल लौट चलें ..






चमकते शहर में अँधेरा कहाँ है                                                            
रुको देखो दिलो में अँधेरा घना है

दौड़ता  शहर है सबका अपना जहाँ है
रास्ता है सफ़र है मगर जाना कहाँ है

यहाँ चमक है दौड़ है रुकना मना है
मेरे यार ये शहर अपना कहाँ है

हर ऊँची छत पे अमीरी को हँसते देखा है
यहाँ मुफलिसों की जगह कहाँ है

चल लौट चलें कस्वे को अपने
इस शहर में मुहब्बत भी निगेहवां है


            

      ......निशान्त यादव

Wednesday, 21 October 2015

परिन्दे अब भी पर तोले हुए हैं / दुष्यंत कुमार

साये में धूप से दुष्यंत कुमार की ये रचना आपको अबके हालात  बयां करती नजर आएगी .. पढ़िए 


परिन्दे अब भी पर तोले हुए हैं
हवा में सनसनी घोले हुए हैं

तुम्हीं कमज़ोर पड़ते जा रहे हो
तुम्हारे ख़्वाब तो शोले हुए हैं

ग़ज़ब है सच को सच कहते नहीं वो
क़ुरान—ओ—उपनिषद् खोले हुए हैं

मज़ारों से दुआएँ माँगते हो
अक़ीदे किस क़दर पोले हुए हैं

हमारे हाथ तो काटे गए थे
हमारे पाँव भी छोले हुए हैं

कभी किश्ती, कभी बतख़, कभी जल
सियासत के कई चोले हुए हैं

हमारा क़द सिमट कर मिट गया है
हमारे पैरहन झोले हुए हैं

चढ़ाता फिर रहा हूँ जो चढ़ावे
तुम्हारे नाम पर बोले हुए हैं

Monday, 19 October 2015

भात की पीर ..

आज दाल भात खाने का  बड़ा मन था अच्छे वाले चावल लिए , मुझे लगा दाल तो शायद रखी है देखा तो दाल थी ही नहीं  | नीचे बनिए की दुकान पर गया दाल के रेट  सुने , सुनते है मन ये भाव आगये , देखिये  दाल भात की कहानी , अच्छे लगे तो खवर दे ..


दाल दाल सब करें  
पीर भात की जाने ना कोई
रुपया बैरी होय गया 
प्रीत भात की समझे ना कोई
देख भात की पीर 
मेरा दिल टूटा  टूटा  जाय 
लपछप उतरा बनिये से बोला
लाला तनिक दाल देओ दिखाय 
लाला आँखे फाडे देखे 
बोला  ! लगते हो अमीर भाय 
हमने भी मन ही मन मुस्काय 
मुंडी दई हलाय 
लाला बोला दौ सौ की है 
तोलूं या फिर नाय
हम भी ठिठके गणित लगाया 
फिर भात का चेहरा याद आया 
पाव भर दाल को पन्नी में करवाया 
चौके में भात मुस्काया 
हमारे दिल को सुकून आया 
सुनो रे बंधू ! सखा सुनो रे 
दिल न दुखाना भात यार का 
तुम्हे कसम दाल की 



                                              दाल भात प्रेमी  ..
                                                                   निशान्त यादव 

Saturday, 17 October 2015

तुम बिन दीप जलाऊ कैसे..

दिवाली खुशिओं , उजालो का त्यौहार है हर कोई ख़ुशी मनाता है लेकिन कोई ऐसा भी होता है जिसके ह्रदय में कहीं विरह का दुःख है और चेहरे पर दिवाली की मुस्कान , जब वो सबके साथ होता तब चेहरे पर ख़ुशी रहती है लेकिन जब वो अकेला छत की  मुंडेल पर बैठा अपने प्रिये की यादो में खो जाता है उसके  सदा के लिए चले जाने का दुःख आज उसे कचोट रहा है अब वो इस ख़ुशी के त्यौहार में अपने दुःख को किसे सुनाये , ये कविता प्रिये से    विरह के  दुःख और दिवाली पर उसकी याद से निकली है उम्मीद है आपको पसंद आएगी





प्रिय तुम बिन दीप जलाऊ कैसे
विरह की जलती ज्वाला से खुशियों के दीप जलाऊं कैसे

तुम जो ठहरे हो नभ में  एक सितारा बनकर
रात अमावस फैल रही है तुम बिन दीप जलाऊ कैसे 

देखो , कहो चाँद से आज रात क़न्दीला बन जाये
या तारो कह दो के दीवारो पर झालर बन जाएँ 

जीवन पथ पर  साथ चले थे जीवन के नए सृजन में
टूटा चाक मेरे जीवन का तुम बिन दीप बनाऊ कैसे 

चारो और उजाला फैला लगा हुआ दीपो का पहरा
मेरा अंतर खाली खाली यहाँ अमावस का है पहरा 

मैं  दीपक था तुम लौ मेरी , तुम शम्मा थी मैं  परवाना
टूटा दीपक , शम्मा भी बुझी , अब न रहा मैं  परवाना 

आँखे मांग रही मुझसे तेरा अक्स प्रिये
क्या कह दूँ अब न आओगी कभी प्रिये 

प्रिय तुम बिन दीप जलाऊ कैसे .....

                                                      

                                                              .....निशान्त यादव

Monday, 5 October 2015

ये साँझ फिर होने को है .....













ये साँझ फिर होने को है
नयन पत्थर हो गए
बाट जोहते प्रिये !
पंछी भी घर को चल दिए
क्या करू घर को चलूँ
या करू अनिश्चित इंतजार
ये प्रेम और अहम् का युध्द है
मैं घायल हूँ इसी समर में
सूर्य गमन से , चन्द्र आगमन तक
ये कुछ पल का अंधकार
तुम्हारे अक्स को धुंधला रहा है
मेरे पास मुहब्बत की शमा है
जो अँधेरे से अक्स को बचाये  हुए है

ये साँझ फिर होने को है .....


                                                                    ........निशान्त यादव

Saturday, 3 October 2015

मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे - दुष्यंत कुमार



मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे
इस बूढे पीपल की छाया में सुस्ताने आयेंगे

हौले-हौले पाँव हिलाओ जल सोया है छेडो मत
हम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आयेंगे

थोडी आँच बची रहने दो थोडा धुँआ निकलने दो
तुम देखोगी इसी बहाने कई मुसाफिर आयेंगे

उनको क्या मालूम निरूपित इस सिकता पर क्या बीती
वे आये तो यहाँ शंख सीपियाँ उठाने आयेंगे

फिर अतीत के चक्रवात में दृष्टि न उलझा लेना तुम
अनगिन झोंके उन घटनाओं को दोहराने आयेंगे

रह-रह आँखों में चुभती है पथ की निर्जन दोपहरी
आगे और बढे तो शायद दृश्य सुहाने आयेंगे

मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता
हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आयेंगे

हम क्यों बोलें इस आँधी में कई घरौंदे टूट गये
इन असफल निर्मितियों के शव कल पहचाने जयेंगे

हम इतिहास नहीं रच पाये इस पीडा में दहते हैं
अब जो धारायें पकडेंगे इसी मुहाने आयेंगे


...............................दुष्यंत कुमार

Saturday, 26 September 2015

जीवन के दो सच ! एक अस्तित्व, एक अंत !


                                                                                              
                                                                                                     
जीवन के दो सच !
एक अस्तित्व, एक अंत !
इन के बीच यात्रा !
भरी मोह से ,
भरी त्याग से ,
भरी प्रेम से ,
भरी द्वेष से ,
भरी क्रोध से
भरी शांति से 
हमें जियें अस्तित्व की लड़ाई में !
मरें सिर्फ एक अच्छे अंत में !
अस्तित्व से अंत तक का सफर !
भरा युद्द से ,
भरा शांति से,
भरा दुष्टता से,
भरा करुणा से ,
भरा अपयश से ,
भरा यश से ,
अंत के बाद का सफर !
कैसा है ? क्यों है ?
ये सिर्फ कथ्य है तथ्य से परे !
हाँ सिर्फ कल्पना है !
ये शून्य होगा ,
ये अनंत होगा ,
ये नर्क होगा ,
ये स्वर्ग होगा ,
हम लड़े !
हम जियें !
अस्तित्व से अंत तक !
जीवन के दो सच !
एक अस्तित्व, एक अंत !



                                                                    ..  निशान्त यादव 

Saturday, 19 September 2015

सौ चांद भी चमकेंगे / जाँ निसार अख़्तर




सौ चांद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी
तुम आये तो इस रात की औक़ात बनेगी

उन से यही कह आये कि हम अब न मिलेंगे
आख़िर कोई तक़रीब-ए-मुलाक़ात बनेगी

ये हम से न होगा कि किसी एक को चाहें
ऐ इश्क़! हमारी न तेरे साथ बनेगी

हैरत कदा-ए-हुस्न कहाँ है अभी दुनिया
कुछ और निखर ले तो तिलिस्मात बनेगी

ये क्या के बढ़ते चलो बढ़ते चलो आगे
जब बैठ के सोचेंगे तो कुछ बात बनेगी



-----जाँ निसार अख़्तर


Monday, 14 September 2015

संभल जाइये ! देश मे शिक्षा , वैज्ञानिकता और सदभाव से प्रगति और उन्नति आएगी


अगर आप देश के नेताओं और उनके भाड़े के टट्टुओं के उन्मादी नारो और भाषणो से , देश की मीडिया के कुछ टी. आर. पी  लोलुप चैनल के हिसाब से अपने पड़ोस के किसी मुस्लिम , जैन , सिख या ईसाई परिवार के प्रति प्रेम या नफरत के भाव लाते है । तब आपको थोड़ा सावधान और समझदार होने की जरुरत है जो लोग पहले गोकशी का विरोध छाती पीट पीट कर करते थे आज वही बहादुर , गाय के रखवाले अपनी राजनीती चमकाने के लिए खुलेआम जैनो के सामने बीफ बेच रहे है ये काम अगर मुस्लिमो ने कर दिया होता तब हम अपनी नफरते लेकर उनके विरोध पहुंच गए होते । जब कुछ भी  खाना या न खाना हमारा अपना अधिकार तब हम एक पक्ष को लेकर इतने सतही क्यों है।

सतर्क और समझदार हो जाइये ये राजनीती आपके और हमारे सदिओं पुराने रिश्तो की जड़ो में मट्ठा डाल रही है जरा सोचिये हमने और आपने गाय के लिए क्या किया । जब देशी गाय ने दूध देना कम कर दिया या फिर बीमारी के कारन बाँझ हो गई हमने उसे अपने घर के खूंटे से खोल कर उस खूंटे पर अफ्रीकन ब्रीड की ज्यादा दूध देने वाली गाय नुमा भेंस को बांध लिया और खुली हुई गाय यहाँ शहर में कच्चा खा खा कर मर रही है

आप जरा सोचिये उपभोक्तावाद के इस संसार मे आप कितने प्राकृतिक बचे । जरा भी नहीं  हमें कॉर्न फ्लेक्स चाहिए , ओनियन चाहिए , सब्जी चाहिए , लेकिन अपना बेटा किसान नहीं चाहिए  ।  किसान  खुद अपने बेटे से खेती करवाना नहीं चाहता  ।  कारण साफ है  देश  जितना इन्वेस्टमेंट अन्य व्यवसाय मे हुआ , जितनी नयी सोच के लोग अन्य व्यवसाय में आये उतने लोगो ने कृषि मे आना मुनासिव नहीं समझा । जब किसान का कोई मुद्दा आता । जब गाय का कोई मुद्दा आता है हम इन राजनैतिक ठगो के साथ खड़े होते । लेकिन जब उन्माद खत्म होता तब सब चेतना खत्म हो जाती है क्या कोई पूछता है देश का किसान किस हालत मे हैं क्या कोई पूछता है की गाय किस हालत मे है आज देश के अंदर कितने पशु चिकित्सालय सही ढंग से काम कर रहे है और उनका स्तर क्या है किसी को खवर नहीं ।  इस लिए हमें देश की मूल समस्याओं पर लड़ना होगा । देश की राजनीती चाहती ही यही है की देश की जनता दंगे , जातिवाद , नफरत मे उलझी रहे । हमें इसी धुर्वीकरण के आधार पर वोट देती रहे  और हम देश की संसद मे मौज मारते रहें !

इसलिए  संभल जाइये !  देश मे शिक्षा , वैज्ञानिकता और सदभाव से प्रगति और उन्नति आएगी , धर्मान्धता , आपसी लड़ाई और द्वेष से नहीं ...

Thursday, 10 September 2015

आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख / दुष्यंत कुमार

दुष्यंत कुमार की कविताओं को पढ़ने का मलतब है क्रांति से मिलना . मुझे तो उनकी कवितायेँ जगाये रखती है आप जब पढ़ते है " एक जंगल है तेरी आँखों में , मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ " तब लगता प्रेम के लिए इससे वेहतर और क्या शब्द होंगे लेकिन जब आप उनकी "हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।" तब आप उसी एहसास के साथ क्रांति से रूबरू होते है

इसी के क्रम दुष्यंत कुमार की कविता साये में धूप  से ..




आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख
घर अँधेरा देख तू आकाश के तारे न देख

एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ
आज अपने बाजुओं को देख पतवारें न देख

अब यक़ीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह
यह हक़ीक़त देख, लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख

वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे
कट चुके जो हाथ ,उन हाथों में तलवारें न देख

दिल को बहला ले इजाज़त है मगर इतना न उड़
रोज़ सपने देख, लेकिन इस क़दर प्यारे न देख

ये धुँधलका है नज़र का,तू महज़ मायूस है
रोज़नों को देख,दीवारों में दीवारें न देख

राख, कितनी राख है चारों तरफ़ बिखरी हुई
राख में चिंगारियाँ ही देख, अँगारे न देख.

Wednesday, 2 September 2015

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये / दुष्यंत कुमार

दुष्यंत कुमार की हर रचना अंतर्मन को झकझोर कर रख देती है कुछ ऐसी ही ये रचनाहै

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये

यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये

न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये

जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिये.

Saturday, 15 August 2015

69वां स्वतंत्रतादिवस अपनी यादों के साथ

14 अगस्त 1947 की अर्धरात्रि में जब भारत के आजाद होने की घोषणा की गई तब के जनमानस के ह्रदय में उठने वाले भावो का आज अंदाज लगाना मुश्किल है क्योकि अब हम आजाद है । हमने उस लड़ाई को सिर्फ किताबो में पढ़ा है इस देश के गुलाम होने और आजाद होने के लड़ाई में बहुत से क्रांतिवीर शहीद हुए।  जो कितावो में दर्ज है उनके अलावा भी तमाम लोग रहे होंगे जो इस देश के लिए शहीद हो गए
भारत के इतिहास में जब आप जायेंगे तो पाएंगे की जब जब ये देश विपत्तियो और समस्याओं से घिरा है तब तब इस देश के नागरिक किसी को आदर्श मानकर उस विपत्ति और समस्या के खिलाफ खड़े हुए है हमने पुराने समय की तमाम कुरीतियों से निजात पायी है हमने अपने सामाजिक विकारो का खुद इलाज किया । एक समय था जब देश जमींदारी और जातिप्रथा के विकारो से युक्त था । आज देश में जातिप्रथा पूर्ण रूप से समाप्त तो नहीं लेकिन काफी हद तक कम हुई है देश का युवा सिर्फ काम और विकास चाहता है वो चाहता है की देश आगे बढे हम सब आगे बढे लेकिन इन सब के बाबजूद आज भी हम कन्या भ्रूण हत्या , स्त्री हिंसा, जैसी समस्याओं से घिरे हुए है कल के सपनो का भारत स्त्री के बिना नहीं बनेगा । जरा सोचिये देश की आधी आबादी स्त्रिओं की है जिसकी प्रतिभा घरो की चारदीवारी में दब कर मर रही है अगर ये प्रतिभा देश के कंधे से कन्धा मिलाकर चले तब इस देश आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता है समय बदल गया है दोस्तों , आप 21वीं सदी में जी रहे है कब तक कुँए के मेंडक सा व्यव्हार करते रहेंगे
अपनी बच्ची को जन्म दीजिये । उसे वेहतर जीवन दीजिये और फिर देखिये  आज की  ये छोटी छोटी लड़कियां इस देश को कहाँ से कहाँ ले जायेगी
इन अब सामाजिक विकारो के इतर एक सबसे महत्वपूर्ण विन्दु है कि क्या हम अपने देश के जिम्मेवार नागरिक है क्या हमारा व्यवहार और आचरण एक जिम्मेवार नागरिक का है मैं कहूँगा नहीं हम अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर रहे है अगर कर रहे है होते तब इस देश में भ्रष्टाचार , दंगे , सामाजिक शोषण जैसी समस्यायें नहीं होती । इसलिए सबसे पहले एक ईमानदार नागरिक बनिये उसके बाद पिता पुत्र भाई या बहन बनिये

अब कुछ बचपन की यादें 15 अगस्त के साथ

बचपन की 15 अगस्त से जुडी तमाम यादें इस दिन वापिस आकर मुझे घेर लेती है कारण है अब 15 अगस्त के दिन वो सब नहीं होता जो स्कूल के दिनों में होता था अब तो इस दिन छुट्टी और होती है  छुट्टी से इस दिन के होने एहसास खत्म हो जाता है बचपन में  इस दिन का इंतजार बड़ी बेसब्री से रहता था माँ सुबह नहला धुला कर नयी यूनिफार्म पहना आँखों में  काजल लगा कर भेजती थी और हम दिलो  में जोश और उत्साह लिए स्कूल दौड़ते निकल जाते थे मै अक्सर झांकियो में चंद्रशेखर आजाद ही बनता था जब झांकी हमारे घर के सामने से निकलती थी तो छाती और चोंडी हो जाया करती थी ये एहसास शब्दों में बयां नहीं कर सकता । इन सब के बाद चार लड्डू मिलते थे इन लड्डुओं को हम कभी रास्ते में नहीं खाते थे घर लाकर माँ के साथ खाते थे मै सच कहूँ तो बूँदी के उस लड्डू का स्वाद अन्य किसी  दिन के लड्डुओं से कई गुना मीठा होता था शायद यही शक्ति है आजादी के इस दिन की वर्ना बूंदी का लड्डू तो हम अकसर खाते ही है
दोपहर को पिता जी कालेज से 1 - 2 किलो लड्डू अलग से लाया करते थे और हमारी लपलपाती जीभ को उनका इंतजार रहता था  । जब बड़ा हुआ तो कक्षा 6 में पिता जी के कालेज में ही पहुँच गया यहाँ हर बार कुछ न कुछ कार्यक्रम अवश्य होते थे मेरा  दोस्त अयाज  जिसकी आवाज बड़ी अच्छी थी काली शेरवानी चूड़ीदार पायजामा और सर पर काली टोपी पहने अकसर इकवाल बनता था और गाता था  सरफ़रोशी की तम्मना अब हमारे दिल में है देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है  मुझे कई बार  कालेज में लड्डू के दोने लगाने और बाँटने वाली टीम में रखा गया उस समय ये भी बड़े गर्ब का काम होता था और हमें सब बच्चों से ज्यादा 8 लड्डू मिला करते थे । बचपन बीता बड़े हुए स्कूल से कालेज गए कालेज से डिग्री कालेज और फिर विश्वविद्यालय अब  ये सफ़र  एक जॉब पर आकर थमा हुआ है लेकिन सच कहूँ न जाने क्यों अब इस दिन बचपन जैसी वो गुदगुदाहट और इंतजार नहीं रहता ये दिन भी हर बीतते दिन की तरह निकल जाता है जब कभी इस दिन घर पर होता हूँ तो  बच्चों में बही पुराना उत्साह और कोतूहल ,  जो कभी हमने जिया , देख कर खुश हो लेता हूँ जिंदगी यही है दोस्तों कभी हँसी कभी उदासी
इस लिए जोर कहिये अब हम आजाद है ये देश आजाद भारत माता की जय !
ये 69वां स्वतंत्रतादिवस आप सब  को दिल से मुवारक
ध्यान रखिये जिम्मेदार नागरिक बनिये बाकि फिर तो देश हम सब आगे ही बढ़ेंगे !
जय हिन्द !