ये साँझ फिर होने को है
नयन पत्थर हो गए
बाट जोहते प्रिये !
पंछी भी घर को चल दिए
क्या करू घर को चलूँ
या करू अनिश्चित इंतजार
ये प्रेम और अहम् का युध्द है
मैं घायल हूँ इसी समर में
सूर्य गमन से , चन्द्र आगमन तक
ये कुछ पल का अंधकार
तुम्हारे अक्स को धुंधला रहा है
मेरे पास मुहब्बत की शमा है
जो अँधेरे से अक्स को बचाये हुए है
ये साँझ फिर होने को है .....
........निशान्त यादव

No comments:
Post a Comment