Friday, 5 September 2014

शिक्षक दिवस पर विशेष - Happy Teachers Day !

आज शिक्षक दिवस है , में सभी शिक्षको को  इस दिन की हार्दिक शुभकामनाओ के साथ सादर प्रणाम करता हूँ
स्वामी विवेकानंद ने कहा था की जिसने एक शब्द भी सिखाया है वो गुरु है और उसका सम्मान करना हमारा कर्तव्य है

जीवन में प्रथम गुरु माँ का मानते है लेकिन जब हम बचपन छोड़कर बड़े होते हैं तब जीवन की परस्थितिओं से लड़ना ,उनका सामना करना और इनसब  को पार करके आगे बढ़कर सफलता के शिखर पर पहुचना ये सब हम समय के साथ -साथ  सीखते जाते हैं , लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है ये है की हमे समय के साथ चलने और परस्थितिओं से लड़ने की सीख गुरु से ही प्राप्त होती है

मुझे याद है जब 12 वीं  में था तब हमारे हिंदी के शिक्षक कहा करते थे , ये जरुरी नहीं की तुम सब सफल हो जाओ और जो सपने तुमने देखे है बो पूरे हो जाएँ , लेकिन जो असफलता तुम देखोगे बो एक दिन तुम्हे जिंदगी का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाएगी , लेकिन शर्त ये की सपने देखना मत छोड़ना , असफलता से कभी घबराना मत और एक दिन तुम अपनी मंजिलों के करीव होगे .

आज में जिंदगी के इस पड़ाव पर आकर ये महसूस करता हूँ , मेरे वो शिक्षक सही थे
मेने असफलताएँ  देखी  , सपनो को टूटते हुए देखा , और जव भी ये हुआ मेरे शिक्षक ये शब्द कान में गूजते रहे , में जितनी बार गिरा उतनी बार मिटटी को झाड़ कर उठा खड़ा हुआ ,

आज सफलता सौ प्रतिशत तो नहीं मिल पायी है लेकिन जीवन में लड़ने का माद्दा तो जरूर आगया है , बाकि तो सारा  जीवन पड़ा है सपने देखते रहिये और अपने शिक्षक की सिखाई हर वो बात जो जीवन में लड़ने की शक्ति देती हो याद करते  रहिये , अपने आप को खुद में प्रेरित करते रहिये , आस पास की हर वो चीज जो आपको कुछ सीखा जाती हो उस से सीखते रहिये और उसका सम्मान करते रहिये और फिर देखिये सफलता सौ प्रतिशत न सही लेकिन आप उसके पाने की लड़ाई में हारेंगे नहीं .


एक बार फिर से सभी शिक्षको को प्रणाम और शुभकामनायें .....

                                                                                           निशान्त यादव  

Saturday, 30 August 2014

ये पल तुम बिन ...A Part of Life With Out You

ये रात का अँधेरा हमसफ़र बन गया है मेरा                     
अब दिन का उजाला रुसवा है मुझसे 
जो पौधा  सींचा था , तुमने मुरझा सा गया है 
रोज पानी देता हूँ तुम्हारे नाम का इसे 
ये अब भी प्यासा सा है 
फूल की कली जुदा हो गई है उससे 
ये भवंरा अब तनहा हो गया है 

* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * 
देखो ये पौधा अब मुस्कुरा सा रहा है 
तुम्हारे कदमो की आहट है 
या फिर वहम इसका 
कोई खवर है या महज अफवाह तुम्हारी 
मेरे ह्रदय में हलचल सी मची है 
शायद दिन का उजाला ,फिर से मेरा हो गया है 
                                
                                                                     निशांत यादव

Thursday, 21 August 2014

ओ मंजिल के राही .................


ओ मंजिल के राही , तू आगे तो बढ़ !                           
मंजिल तेरी, सपने तेरे , तू आगे तो बढ़ !!    

माना कठिन डगर है तेरी , तू  आगे तो बढ़ !  
फूल नहीं कांटें ही सही , तू आगे तो बढ़ !!

 देख खड़े है द्रोण ,तू एकलव्य तो बन !
देख खड़े हैं कृष्ण , तू अर्जुन तो बन !!

कठिन डगर यहाँ सत्य की  , तू बुद्ध तो बन !
है अहिंसा तेरे द्वारे , तू गांधी तो बन !!

आशा भरी निगाहें देखे ,तू आगे तो बढ़ !
बुला रही है तेरी मंजिल ,तू आगे तो बढ़ !!

देख आसमाँ तुझे निहारे , तू आगे तो बढ़ !
खड़ी है धरती बाहँ पसारे , तू आगे तो बढ़!!

ओ मंजिल के राही , तू आगे तो बढ़ !
मंजिल तेरी, सपने तेरे , तू आगे तो बढ़ !!
                                                         
                                                   ...निशान्त यादव ...

Friday, 15 August 2014

68 वी आजादी ....

 68 वी  आजादी .... 



68 वी  आजादी .... ये  नाम इस लिए दिया है हम हर साल अपनी तमाम समस्याओं से आजाद होते है और कुछ रह जाती है आज का दिन खुशी मानाने का दिन है.15 अगस्त 1947 को हम अंग्रेजी सरकार से आजाद हो गए थे . इस आजादी के लिए जो त्याग हुए उन्हें कौन भूल सकता है 1947 से लेकर आज तक हम भारतीय इस देश के त्याग के लिए पीछे नहीं रहें , में उन सब शहीदों को नमन करता हूँ . 

एक बार चर्चिल ने कहा था की आजादी के बाद भारत बिखर जायेगा 
लेकिन सरदार पटेल जेसे महानायक ने उनकी इस आशंका को झूठा सिद्द कर दिया उन्होंने हिदुस्तान के तमाम अलग -अलग रियासतों को हिंदुस्तान में मिलाकर एक मजवूत भारतीय लोकतंत्र का निर्माण किया और इस तरह हम 26 जनवरी 1950 को एक  मजवूत गणतंत्र के रूप में उभरे , मुझे आज गर्व है की हमने उस लोकतंत्र को टूटने नहीं दिया जवकि तमाम सुधारो  के बाद और मजवूत किया है आज भारत विश्व में सबसे बड़े  और मजवूत लोकतंत्र की मिसाल है हम विश्व गुरु बनने की राह पर हैं सारा विश्व हमारी तरफ आशा भारी निगाहों से देख रहा है और मुझे विश्वास है की हम इस आशा को टूटने नहीं देंगे . आज का दिन हमे अपने स्व्मुल्याकन का भी दिन है , हमने पिछले 67 सालो बहुत पाया है हमने सूचना , अन्तरिक्ष और विज्ञानं और चिकित्सा में एक मुकाम हासिल किया है आज हम गेहूं, चावल , गन्ने के सबसे बड़े उत्पादक है

इन सब सबल  पक्षों के आलावा हमारी अपनी आन्तरिक समस्याएँ भी है , खास तौर में यहाँ अपनी सरकारी योजनाओ के बारे में बात कर रहा हूँ हमने शिक्षा का अधिकार कानून लागु किया है इसके तहत शिक्षा योजना पहुच रही है लेकिन शिक्षा का  स्तर निरंतर गिर रहा है सरकारी प्राथमिक विद्यालय के छात्र को वुनियादी शिक्षा का भी ज्ञान नहीं है ध्यान रहे अच्छी शिक्षा ही मजवूत देश का और समाज का निर्माण करती है यही हाल उच्च शिक्षा का भी है छात्रों को दुसरे देशो में  जाना पड़ता है इसका सीधा असर उनपर आर्थिक रूप से पड़ता है
चिकित्सा के में भी हमारी उपलब्धि खास नहीं है हम एम्स जेसे बड़े अस्पतालों के आलावा किसी अन्य सरकारी अस्पताल में इलाज से डरते है , आज भी  गर्भवती महिलाऐं डिलीवरी के समय मर जाती है , हमारी शिशु मृत्यु दर अधिक है क्योंकि या तो समय में उन्हें अच्छी चिकित्सा नहीं मिलती या फिर अस्पताल उनकी पहुँच से दूर होता है

बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है ये बात सच है   सरकारी विभागों में सब को रोजगार नहीं मिल सकता  लेकिन हम छोटे -छोटे कुटीर उद्योगो  में माध्यम से बेहतर रोजगार प्रदान कर सकते हैं जवकि इसके उलट हमरे कुटीर उद्योग बंद होते जारहे हैं 

भ्रस्टाचार देश की सबसे बड़ी समस्या उभरी है सरकारी योजनाये अंतिम व्यक्ति तक न पहुंच कर सिर्फ  चंद लोगो की प्रगति का मार्ग बन गई हैं ध्यान रहे जबतक योजना भारत के अंतिम व्यक्ति तक अपने वास्तविक रूप में नहीं पहुंचेगी हम अपना विकास कभी नहीं कर सकते , भ्रस्टाचार अब तो मानसिक विकृति की तरह हो गया है , जव हमारी वारी आती है तो हम भी घूस खोरी से नहीं चूकते इस लिए देश सभी नागरिको को आज के दिन इस विकृति को दूर करने का संकल्प लेना होगा 

सामाजिक स्तर   पर भारत का विकास  हुआ है लेकिन आज भी हम  तमाम सामाजिक संशयों से गुजर रहे हैं कानून के बल  पर ३३ प्रतिशत आरक्षण के तहत हमने महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाया है लेकिन सामाजिक स्तर पर ये स्वीकार्य नहीं है आज महिलाओं के साथ दहेज़ हत्या , वलात्कार , और गर्भ में ही लड़किओं की हत्या जैसे अपराधो में हर दिन बढ़ोतरी हो रही है , यदि हमें इस देश को आगे लेजाना है तो सामाजिक सुधर करने ही होंगे , अन्यथा ये सभी प्रगति छलावा ही सावित होंगी .
 दूसरी सबसे बड़ी  वर्तमान सामाजिक समस्या उभरी है सामाजिक वैमनस्य पिछले कुछ दिनों में जिस तरीके भारत में सामाजिक सौहार्द बिगड़ा है उससे ये बात उभरती है की हमारे सामजिक तार  कही न कही टूटे है हम किसी के भी भड़काने पर एक दूसरे को मारने के लिए तलवारे उठा लेते है , हमने अब धर्म और समाज के ठेकदार वो लोग चुने है जो रसूख बाले है हमें इसे तोड़ ऐसे लोगो को चुनना होगा जो सामजिक बुद्दिमता रखते हो 

आइये आज के दिन हम सव एक शपथ लेते हैं की हम भारत के नागरिक अपने देश को सामाजिक , आर्थिक , और लोकतान्त्रिक मूल्यों पर और मजवूती के साथ आगे  ले जायंगे तभी हम इस महापर्व को मानाने के सच्चे अधिकारी होंगे  .

सभी देशवासिओं को स्वतंत्रता दिवस को हार्दिक शुभकामनाएं  

जय हिन्द , जय भारत 
निशांत यादव 

#HappyIndependenceday #India

Saturday, 26 July 2014

कारगिल का दर्द

26 जुलाई 1999 आज ही के दिन कारगिल युद्द समाप्त हुआ, भारतीय सेना की विजय हुई, हमारे जवान भी शहीद हुए, सेना के जवानों ने अपनी जिंदगी को खो कर कर इस देश को सुरक्षित रखा , इसे किसी मोके पर हम अपने  सैनिको के बहादुरी के किस्से बड़े गर्व से कहते है  , इन सब सुखद पहलुओ के अलावा कुछ ऐसा भी है जो दुखद है  
जो आपके जिगर का टुकड़ा हो और वो इक दिन चला जाए तो जिंदगी कितनी कठिन और अधूरी हो जाती है इसका अहसास ही रोंगटे खड़े कर देता , और अगर इस सब के बाबजूद कोई अपने आप को इस दुःख से निकाल भी ले तो फिर सियासत , और समाज की उपेक्षा जीने नहीं देती है तब आता है की मेरा बेटा ही क्यूँ देश के लिए लड़ें .. 

कारगिल में शहीद हुए तमाम जवानों और अफसरों के परिवार बाले उनके शहीद होने के बाद सरकार से मिली सुविधाओं के लिए  अपनी ही सरकार के सिस्टम से लड़ें . केप्टन अनुज नायर के पिता को पेट्रोल पम्प मिला और उसे लेने के लिए उन्हें कितने बुरे अनुभवों से गुजरना पड़ा , ये कोई उनसे जाके पूछे तब आपको अपने इस देश और सिस्टम से नफरत हो जाएगी , केप्टन अनुज नायर के पिता ही नहीं न जाने कितने जवानों को अपने हक के लिए लड़ना पड़ा , और कुछ तो अब भी लड़ रहे है केप्टन अनुज नायर के पिता को मेने IBN के जिंदगी लाइव प्रोग्राम में देखा उनके आँखों से बहते आंसू देखा कर मुझे इस सिस्टम से नफरत हो गई , उनके आंसू बेटे के शहीद होने के नहीं थे , वल्कि उसके बाद इस सिस्टम के लोगो ने उनके साथ जो व्यव्हार किया उसके आंसू ज्यादा थे यदि आप देखना चाहे तो यहाँ देखे
   

आज ही मेने NDTV  पे देखा की मेजर डीपी सिंह तो आज तक अपने हक के लिए लड़ रहे है , उनके विडियो को देखा http://khabar.ndtv.com/video/show/news/331393, उनकी आवाज में दर्द के साथ साथ इक चेतावनी भी है की हमें सुधारना होगा वर्ना देश के युवाओं में निराशा का माहौल हो जायेगा
आज जिस तरीके से सेना में अफसरों की भारी कमी वो कभी पूरी नहीं होगी ,

हमें और ख़ास तौर से इस सिस्टम को चलाने वाले लोगो  समझना होगा कि यदि हम अपने सैनिको , जवानों के साथ ऐसा व्यबहार करेंगे तो , हम अपने देश के नवयुवको में देश सेवा का के लिए केसे प्रेरित कर पायंगे ,

इसी दर्द से निकली कुछ पक्तियां कह रहा हूँ

सरहदे खिची शमशीरें तनी                                                    
बंदूकें चली लहू वहा
मुझे क्या मिला
किसी अपने का लहू
उसकी छोड़ी हुई निशानी
और हाँ
कुछ चंद सिक्के सियासतदानों के ,

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जो जिन्दा रहा उसे जिंदगी ने तोडा
जिंदगी से जीता तो  अपने हक़ को लड़ा
हक़ न मिला अफसोस हुआ जिन्दा होने पे ,
काश में भी शहीद होता ..

निशांत यादव 



Friday, 25 July 2014

तेरा अहसास , मेरे शब्द और तन्हाई

तेरी दूरी से बनी तन्हाई से दूर गया                                  

कुछ सुकून की तलाश में
भीड़ में ढूंढा उसे  मिला ही नहीं
कुछ शब्दों से भरे अहसास ले गया
वो भी लुटा आया भीड़ में
अब लौटा हूँ  एक सच के साथ
तेरा अहसास , मेरे शब्द और तन्हाई
ये ही हमसफ़र है मेरे

                                                 

निशांत यादव 

Friday, 4 July 2014

सागर से दूर एक सूखी नदी

ऐ हवाओं जरा ठहरो
मैं  भी आता हूँ

तुम लायी हो ठन्डे झोके                                                           
मैं  भी एक गीत गाता हूँ

तुम लाये हो सावन का मौसम  
मैं  भी एक मल्हार गाता हूँ

तुमने भेजे हैं बूदों के मोती 
मैं  भी एक माला पिरोता हूँ 

ऐ हवाओं जरा ठहरो

मैं  भी आता हूँ
तुम आई हो सागर से मिलके 
आओ मैं  भी तुम्हे अपनी नदी से मिलाता हूँ

लौट कर जाओ तो सागर से कहना
ये नदी अब सूखी है

लौट कर जाओ तो सागर से कहना
ये नदी तुम्हारे मिलन को तरसती है

लौट कर आओ तो कुछ बुँदे ले आना
ये नदी बिन आँसुओं के रोती है 

ऐ हवाओं जरा ठहरो
मैं  भी आता हूँ

ये जो लिखा है कुछ अधूरा सा है
शायद पेड़ों का दर्द और पंछिओं कि प्यास अभी बाकि है
                                                                                     
.....(निशांत यादव )


Wednesday, 2 July 2014

अस्वीकार्य सत्य

तुम्हारा जाना या फिर किसी और का आना सबसे बड़ा सत्य है
लेकिन ये सत्य मुझे स्वीकार नहीं है
मेने सत्य को पूजा है सत्य को जिया है
मेरा बीता हुआ कल या आने वाला कल भी सत्य ही है     
में इस सारे सत्य को नकारता हूँ ,
तुम्हारे मेरे जीवन में होना भी तो एक सच था
आज तुम नहीं , मेरे लिए तुम्हारा न होना ही झूट है
तो फिर में इस सत्य को क्यों स्वीकार करूँ ,
देखो न जव से मेने इस सत्य को अस्वीकार किया है ,
ये जमाना मुझे झूठा कहता है
तुमने मुझसे वादा लिया था की तुम्हारे जाने के बाद में तुम्हे याद रखूँगा
देखो न मेने बही तो किया , लेकिन लोगो ने मुझसे सत्य निष्ठ होने का ताज छीन लिया ,
अब ये जीवन के असत्य के साथ ..................

Friday, 20 June 2014

डायरी के पन्नो के बीच कुछ कहती गुलाब की पंखुड़िआ

"डायरी के पन्नो के बीच कुछ कहती गुलाब की पंखुड़िआ "
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कुछ साल पहले तुम्हारे दिए गुलाब की पंखुड़िआ अब सूख गई हैं   
तुम्हारी लिखावट के साथ डायरी के पन्नो में सहेज के रखा है इन्हे           
जब भी डायरी के उन पन्नो को खोलता हूँ 
पन्नो के बीच दबी ये पंखुड़िआ मुझे ताजी सी लगने लगती है 
शायद अब भी ये तुम्हारी उंगलिओं की छुअन के इंतजार में है 
एक पल का ही सही मगर मुझे भी तुम्हारे होने का भ्रम होने लगता है 
लोग सही कहते है अहसास कभी मरते नहीं है 
देखो न मरते तो फिर ये पंखुड़िया 
तुम्हारी लिखावट के साथ डायरी के पन्नो में न होती ,
चलो कुछ दिन और जीता हूँ इन सूखी पँखुडिओं के साथ 
सिर्फ तुम्हारे करीव होने के भरम में

                                                       निशांत यादव 
                                                                                               

Tuesday, 17 June 2014

शहर की चमकती रातें और मेरा ख्वाव ..........

शहर की चमकती रातों में सुकून ढूढ़ताहूँ
बत्तिओं की चमक में जुगनुओं को ढूढ़ताहूँ ,                                               
मैं रोज ,
चमक को छोड़कर आशियाँ की तरफ निकलता हूँ ,
अँधेरी रात के ख्वावो से गुजरता हूँ ,
कभी आया था मंज़िल की तलाश में
अब खुद ही बेख़वर हूँ
तलाश - ऐ- मंजिल से अपनी ,
वो रातें गाँव की अब भी जेहन में है
शांत सुकून से भरी रात
झींगुर की चर्र -चर्र , जुगुनू की टिम- टिम
कड़कती ठंडी सी रातो में आग से तापना
झट से ख्वाव टूटा ,
मेरा आशियाँ करीव था और मेरा ख्वाव
मुझसे दूर .........................

                                                              निशांत यादव 

Sunday, 8 June 2014

माँ की गिलहरी

एक 28 साल का शादी शुदा लड़का अपनी बूढी माँ के साथ पार्क में लगी बड़ी सी कुर्सी पे बेठा था ,
माँ काफी बूढी हो गई सो आँखों से दिखता भी कम था , माँ को कुछ धुंधला सा दिखाई दे रहा था
माँ ने बेटे से पूछा बेटा ये क्या है? बेटा बोला माँ गिलहरी है ,
थोड़ी देर बाद माँ ने फिर पूछा बेटा ये क्या है ? बोला माँ गिलहरी है ,

माँ  ने ऐसा 4-5 बार पूछ लिया , अगली बार लड़का झल्लाया और  चिल्ला कर वोला कितनी बार बता चुका हूँ 
गिलहरी है गिलहरी है  , सुनाई नहीं देता , बुढ़ापे में तुम्हारे कान भी बहरे हो गए है ,
माँ का ह्रदय द्रवित हो गया , लेकिन माँ तो माँ है , वो संभल कर , एक डायरी बेटे की ओर करते हुए वोली ,
बेटा जरा देख तो सही ये किसकी डायरी है , बेटे ने डायरी खोली और , डायरी के चोथे पन्ने को  पढ़ के लड़के की आखों
में आंसू आगये  ,डायरी में लिखा था... " बचपन में तूने 21 बार पूछा था माँ ये क्या है और माँ ने प्यार से २१ बार एक ही जवाव दिया था "
......बेटा ये गिलहरी है गिलहरी है ...



        निशान्त यादव     


Monday, 2 June 2014

जिंदगी के इस सफ़र में इक मुकाम चाहता हूँ

जिंदगी के इस सफ़र में इक मुकाम चाहता हूँ ,                                                

गिर के फिर से उड़ना चाहता हूँ|
आज जब मुझको लगा मिल गया मेरा मुकाम, 
पर ये फिर से बेबफाई कर गया|

जिंदगी के इस सफ़र में इक मुकाम चाहता हूँ , 
टूट कर फिर से जुड़ना चाहता हूँ|

जिंदगी क्यू इतनी कठिन है 
 इसका जबाब चाहता हूँ ,
पूछता हूँ जब खुदा से बता इसका फ़साना क्या है ,

मुस्कुरा के बस इतना कहता , 
जिंदगी इक रास्ता है ,
डूंड ले अपने मुकाम को ,
रास्ते में तेरा मुकाम  है ,

आज में फिर से चला हूँ 
आज में फिर से खडा हूँ ,
जिंदगी के इस सफ़र में इक मुकाम चाहता हूँ|

निशान्त यादव...........

Sunday, 1 June 2014

ये जो बादल तेरी यादों के घुमड़ते हैं !

ये जो बादल तेरी यादों के घुमड़ते हैं !
बरसते ही नहीं !
जब ये गरजते हैं !
तो टकटकी लगा लेता हूँ 
बस कुछ बूंदो के इंतजार में !
देख ये अब फिर घुमड़े हैं !
पूछा तो बोले !
बूंदे तेरी कैद में हैं !
                                 ......(निशान्त यादव )