Tuesday, 17 June 2014

शहर की चमकती रातें और मेरा ख्वाव ..........

शहर की चमकती रातों में सुकून ढूढ़ताहूँ
बत्तिओं की चमक में जुगनुओं को ढूढ़ताहूँ ,                                               
मैं रोज ,
चमक को छोड़कर आशियाँ की तरफ निकलता हूँ ,
अँधेरी रात के ख्वावो से गुजरता हूँ ,
कभी आया था मंज़िल की तलाश में
अब खुद ही बेख़वर हूँ
तलाश - ऐ- मंजिल से अपनी ,
वो रातें गाँव की अब भी जेहन में है
शांत सुकून से भरी रात
झींगुर की चर्र -चर्र , जुगुनू की टिम- टिम
कड़कती ठंडी सी रातो में आग से तापना
झट से ख्वाव टूटा ,
मेरा आशियाँ करीव था और मेरा ख्वाव
मुझसे दूर .........................

                                                              निशांत यादव 

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