Tuesday, 13 June 2017
Sunday, 28 May 2017
पं नेहरू को बाजपेयी जी द्वारा संसद में दी गई श्रद्धांजलि
पंडित जवाहर लाल नेहरू के देहावसान के पश्चात संसद में अटल बिहारी वाजपेई के उद्बोधन के मुख्य अंश---
महोदय,
एक सपना था जो अधूरा रह गया, एक गीत था जो गूँगा हो गया, एक लौ थी जो अनन्त में विलीन हो गई। सपना था एक ऐसे संसार का जो भय और भूख से रहित होगा, गीत था एक ऐसे महाकाव्य का जिसमें गीता की गूँज और गुलाब की गंध थी। लौ थी एक ऐसे दीपक की जो रात भर जलता रहा, हर अँधेरे से लड़ता रहा और हमें रास्ता दिखाकर, एक प्रभात में निर्वाण को प्राप्त हो गया।
मृत्यु ध्रुव है, शरीर नश्वर है। कल कंचन की जिस काया को हम चंदन की चिता पर चढ़ा कर आए, उसका नाश निश्चित था। लेकिन क्या यह ज़रूरी था कि मौत इतनी चोरी छिपे आती? जब संगी-साथी सोए पड़े थे, जब पहरेदार बेखबर थे, हमारे जीवन की एक अमूल्य निधि लुट गई। भारत माता आज शोकमग्ना है – उसका सबसे लाड़ला राजकुमार खो गया। मानवता आज खिन्नमना है – उसका पुजारी सो गया। शांति आज अशांत है – उसका रक्षक चला गया। दलितों का सहारा छूट गया। जन जन की आँख का तारा टूट गया। यवनिका पात हो गया। विश्व के रंगमंच का प्रमुख अभिनेता अपना अंतिम अभिनय दिखाकर अन्तर्ध्यान हो गया।
महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में भगवान राम के सम्बंध में कहा है कि वे असंभवों के समन्वय थे। पंडितजी के जीवन में महाकवि के उसी कथन की एक झलक दिखाई देती है। वह शांति के पुजारी, किन्तु क्रान्ति के अग्रदूत थे; वे अहिंसा के उपासक थे, किन्तु स्वाधीनता और सम्मान की रक्षा के लिए हर हथियार से लड़ने के हिमायती थे।
वे व्यक्तिगत स्वाधीनता के समर्थक थे किन्तु आर्थिक समानता लाने के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने समझौता करने में किसी से भय नहीं खाया, किन्तु किसी से भयभीत होकर समझौता नहीं किया। पाकिस्तान और चीन के प्रति उनकी नीति इसी अद्भुत सम्मिश्रण की प्रतीक थी। उसमें उदारता भी थी, दृढ़ता भी थी। यह दुर्भाग्य है कि इस उदारता को दुर्बलता समझा गया, जबकि कुछ लोगों ने उनकी दृढ़ता को हठवादिता समझा।
मुझे याद है, चीनी आक्रमण के दिनों में जब हमारे पश्चिमी मित्र इस बात का प्रयत्न कर रहे थे कि हम कश्मीर के प्रश्न पर पाकिस्तान से कोई समझौता कर लें तब एक दिन मैंने उन्हें बड़ा क्रुद्ध पाया। जब उनसे कहा गया कि कश्मीर के प्रश्न पर समझौता नहीं होगा तो हमें दो मोर्चों पर लड़ना पड़ेगा तो बिगड़ गए और कहने लगे कि अगर आवश्यकता पड़ेगी तो हम दोनों मोर्चों पर लड़ेंगे। किसी दबाव में आकर वे बातचीत करने के खिलाफ थे।
महोदय, जिस स्वतंत्रता के वे सेनानी और संरक्षक थे, आज वह स्वतंत्रता संकटापन्न है। सम्पूर्ण शक्ति के साथ हमें उसकी रक्षा करनी होगी। जिस राष्ट्रीय एकता और अखंडता के वे उन्नायक थे, आज वह भी विपदग्रस्त है। हर मूल्य चुका कर हमें उसे कायम रखना होगा। जिस भारतीय लोकतंत्र की उन्होंने स्थापना की, उसे सफल बनाया, आज उसके भविष्य के प्रति भी आशंकाएं प्रकट की जा रही हैं। हमें अपनी एकता से, अनुशासन से, आत्म-विश्वास से इस लोकतंत्र को सफल करके दिखाना है। नेता चला गया, अनुयायी रह गए। सूर्य अस्त हो गया, तारों की छाया में हमें अपना मार्ग ढूँढना है। यह एक महान परीक्षा का काल है। यदि हम सब अपने को समर्पित कर सकें एक ऐसे महान उद्देश्य के लिए जिसके अन्तर्गत भारत सशक्त हो, समर्थ और समृद्ध हो और स्वाभिमान के साथ विश्व शांति की चिरस्थापना में अपना योग दे सके तो हम उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने में सफल होंगे।
संसद में उनका अभाव कभी नहीं भरेगा। शायद तीन मूर्ति को उन जैसा व्यक्ति कभी भी अपने अस्तित्व से सार्थक नहीं करेगा। वह व्यक्तित्व, वह ज़िंदादिली, विरोधी को भी साथ ले कर चलने की वह भावना, वह सज्जनता, वह महानता शायद निकट भविष्य में देखने को नहीं मिलेगी। मतभेद होते हुए भी उनके महान आदर्शों के प्रति, उनकी प्रामाणिकता के प्रति, उनकी देशभक्ति के प्रति, और उनके अटूट साहस के प्रति हमारे हृदय में आदर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं उस महान आत्मा के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
*-श्री अटल बिहारी वाजपेयी*
(29 मई, 1964 को संसद में दिया गया भाषण)
Thursday, 11 May 2017
उस दिन आसमान लाल था
उस दिन नीला आसमान , भयानक लाल-काले बादलों से भरा हुआ था , लाल रंग से आसमां को ढके बादल , उड़ते पंछियों की अकुलाहट ,दूर कहीं से आती हुई हवा की सायं सायं और श्याम इस लम्हे को बाहें फैलाये आसमां की तरफ देखता ! इस लम्हे को समेट लेना चाहता था, उसे मां की कही वो बात याद आयी कि जब आसमां ग़ुलाबी हो तो समझो कि बरसात आने को है ये उड़ते पंछी उसके आने की तश्दीक करते हैं
हवा और तेज हुई हवा के झोकें जैसे जमीं से उड़ा ले जाना चाहते थे, और वो..... आँखे बंद किये बचपन से अबतक की सब बरसातों के लम्हो को एक एक कर फिर से जी रहा था,
तभी आसमां से एक बड़ी मोटी बूँद टप से चेहरे पर गिरी , फ़ोन की घंटी बजी उधर से आवाज आई छोटे माँ ... नहीं रही ..
जिस्म पत्थर हो गया ..काली घनघोर घटा , हवा के तेज झोंकें श्याम का सबकुछ बहा ले गए
न उसकी आवाज थी न आँसू थे थी तो सिर्फ कानों में गूँजती आवाज ... बेटा अँधेरा होने को है तू घर कब आएगा ....
Thursday, 27 April 2017
Friday, 21 April 2017
अंदाज़-ए-बयाँ 'ग़ालिब'
हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और
बल्लीमाराँ के मोहल्लों की वो
पेचीदा दलीलों की-सी गलियाँ
सामने टाल के नुक्कड़ पे, बटेरों के क़सीदे
गुडगुडाती हुई पान की पीकों में वह दाद, वह वाह-वा
चंद दरवाजों पे लटके हुए बोसीदा-से कुछ टाट के परदे
एक बकरी के मिमियाने की आवाज़
और धुंधलाई हुई शाम के बेनूर अँधेरे
ऐसे दीवारों से मुंह जोड़ के चलते हैं यहाँ
चूड़ीवालान के कटरे की 'बड़ी बी' जैसे
अपनी बुझती हुई आँखों से दरवाज़े टटोले
इसी बेनूर अँधेरी-सी गली क़ासिम से
एक तरतीब चराग़ों की शुरू होती है
एक क़ुरान-ए-सुख़न का सफ़ा खुलता है
'असद उल्लाह खाँ ग़ालिब' का पता मिलता है
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है
Thursday, 30 March 2017
माना की हम यार नहीं/Mana ki ham yar nahi /parinati chopra/lyrics
माना की हम यार नहीं
लो तय है के प्यार नहीं
फिर भी नज़रें ना तुम मिलाना
दिल का ऐतबार नहीं
माना के हम यार नहीं
रास्ते में जो मिलो तो
हाथ मिला ने रुक जाना
हो ओ.. साथ में कोई हो तुम्हारे
दूर से ही तुम मुस्काना
लेकिन मुस्कान हो ऐसी
के जिसमे इकरार नहीं
नज़रों से ना करना तुम बयां
वो जिसे इनकार नहीं
माना के हम यार नहीं
फूल जो बंद है पन्नो में तो
उसको धूल बना देना
बात छिड़े जो मेरी कहीं
तुम उसको भूल बता देना
लेकिन वो भूल हो वैसी
जिसे बेजार नहीं
लेकिन वो भूल हो वैसी
जिसे बेजार नहीं
तू जो सोये तो मेरी तरह
एक पल भी करार नहीं
माना की हम यार नहीं
Sunday, 26 March 2017
मिटने का अधिकार! / महादेवी वर्मा
महादेवी वर्मा जिन्हें आधुनिक मीरा कहा जाता है आज उनका जन्म दिवस है उनका जन्म 26 मार्च सन् 1907 को (भारतीय संवत के अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा संवत 1964 को) प्रात: ८ बजे फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश के एक संपन्न परिवार में हुआ। इस परिवार में लगभग २०० वर्षों या सात पीढ़ियों के बाद महादेवी जी के रूप में पुत्री का जन्म हुआ था। अत: इनके बाबा बाबू बाँके विहारी जी हर्ष से झूम उठे और इन्हें घर की देवी- महादेवी माना और उन्होंने इनका नाम महादेवी रखा था।
महादेवी वर्मा के हृदय में शैशवावस्था से ही जीव मात्र के प्रति करुणा थी, दया थी। उन्हें ठण्डक में कूँ कूँ करते हुए पिल्लों का भी ध्यान रहता था। पशु-पक्षियों का लालन-पालन और उनके साथ खेलकूद में ही दिन बिताती थीं। चित्र बनाने का शौक भी उन्हें बचपन से ही था। इस शौक की पूर्ति वे पृथ्वी पर कोयले आदि से चित्र उकेर कर करती थीं। उनके व्यक्तित्व में जो पीडा, करुणा और वेदना है, विद्रोहीपन है, अहं है, दार्शनिकता एवं आध्यात्मिकता है
जिनको आता है मुरझाना,
वे तारों के दीप, नहीं
जिनको भाता है बुझ जाना!
वे सूने से नयन,नहीं
जिनमें बनते आँसू मोती,
वह प्राणों की सेज,नही
जिसमें बेसुध पीड़ा, सोती!
वे नीलम के मेघ, नहीं
जिनको है घुल जाने की चाह
वह अनन्त रितुराज,नहीं
जिसने देखी जाने की राह!
ऎसा तेरा लोक, वेदना
नहीं,नहीं जिसमें अवसाद,
जलना जाना नहीं, नहीं
जिसने जाना मिटने का स्वाद!
क्या अमरों का लोक मिलेगा
तेरी करुणा का उपहार
रहने दो हे देव! अरे
यह मेरे मिटने का अधिकार!
Wednesday, 22 March 2017
माँ रिश्तों में पुल सी है
माँ रिश्तों में पुल सी है
माँ रिश्तों में पानी की धारा है
माँ रिश्तों में ठण्डी हवा का झोंका है
माँ जब तक है
भाई से भाई जुड़ा है
संतान पिता से जुडी है
भाई बहन से जुड़ा है
उसके होने से रिश्तों के दो किनारे हमेशा जुड़े हैं
जहाँ नहीं है
वहाँ रिश्तों की नदी सूखी है
दोनों किनारे एक दूसरे का मुँह ताकते है
ये कविता अधूरी है चाहता हूँ अधूरी ही रहे !
―निशान्त
Tuesday, 21 March 2017
सोशलिस्ट
इस बार चुनाव के दौरान जब धर्मिक और सामाजिक विद्वेष की बात आयी तब मित्रों की चर्चा में मैंने कहा कि इसका समाधान ही हमारे हित में है सबको एक चश्मे से न देखे , अगर कहीं चार दूषित व्यक्ति दिखें तो चार हजार को उसी दोष में न लपेटें , लेकिन इस सब के बात मुझपर ये तोहमत लगी हम जैसे लड़के जो गाँव कस्बो से दूर किसी शहर में पढ़ रहे हैं या कुछ काम -धाम लगें हैं वे सोशलिस्ट हो जाते हैं हकीकत पर बात नहीं करते , दरअसल उनके हिसाब से हकीकत ये है कि जो चार दोषी हैं उन्हें वो चार हजार क़ौम और जात , मुल्क और समाज से गद्दारी करने को कहती है ये सब सोचा समझा है इस लिए इसका इलाज बेदख़ली , जुल्म और बदनामी है, ये पढ़े नहीं , औलाद बहुत ज्यादा हैं , रंग से काले और गंदे है , स्त्री हैं रहने का सऊर नहीं, इस लिए ये जब जन्मजात ऐसे हैं तब इनसे सुरक्षित रहने का तरीका सिर्फ इनको दफन या कमज़र्फ बना देने है , हमने कहा ये पढ़ें, इन्हें बराबरी का मौका मिले , तो सुधार जरूर होगा, देखो जिन्हें मौका मिला वो भी तो बेहतर हुए, बस इसी सोच की तोहमत सोशलिस्ट होना है मैने तोहमत शब्द का इस्तेमाल इस लिए किया क्यों की वे इसे कोई अच्छी उपाधि नहीं मानते हैं उनके लिए अच्छे शब्द या उपाधि बफादार, देशभक्त , और अपनी जाति धर्म के हित की सोच रखने वाला , ये शब्द आम समाज में अच्छे और बेहतर हैं बस ये आपको मिलेंगे तभी जब इसके उलट दूसरे का अहित भी करने का माद्दा रखते हों
एक सवाल ये भी है कि सोशलिस्ट कम्युनिस्ट, जैसे शब्द आम समाज की नजर में स्वीकार क्यों नहीं हैं सिर्फ नारों तक सीमित क्यों है इसका कारण है कि जो इनके पैरोकार थे उन्होंने इनका इस्तेमाल सत्ता पाने के लिए किया, बाद जब सत्ताधारी हुए तब वे भी उसी में घुल गए ,
बैसे तो समाज की बेहतरी के लिए न तो मैं कुछ कर रहा हूँ और न ही वे मेरे मित्र लेकिन हम इसके बाबजूद हिस्सा तो इसीका हैं क्या पता कोई हमें सुन कर , पढ़ कर, या हमारे द्वारा किये कार्यों को देख कर सीख रहा हो, वो कुछ नहीं तो मेरे परिवार का हो सकता हैं
इस लिए मैं ये जानते हुए कि नफरत और असमानता की खाई एक दिन हमें भी अपनी और खींच कर दफ़्न कर देगी , खुद को सोशलिस्ट ही बनाने में लगा हूँ आप जो रहना चाहें रहिये , लेकिन बस नफरत और असमानता की खाई को पाटने के लिए एक मुट्ठी मिट्टी अपनी तरफ से भी डालिये , ये हमारे आगे आने वाले समाज, मुल्क़ और क़ौम को जिंदा और खुशनुमा रखने के काम आएगी ......
Monday, 13 March 2017
ले भगवा रंग पिचकारी में मोदी घुस गये यूपी
इस होली पे थोड़ी राजनीतिक चुहल के साथ सबको होली मुबारक .. मजे लीजिये इन लाइनों का और साथ में होली का ...
ले भगवा रंग पिचकारी में
मोदी घुस गये यूपी
भइया लाए लाल हरा
बुआ ले आईं नीला
पब्लिक दे गई एसो गच्चा
बुआ -भतीजे रंग गए भगवे में
जोगीरा सा रा रा रा ।
पब्लिक यूपी की दे गई गच्चा
राजा बन गये मोदी चच्चा
अखिलेश से नाराज हैं चच्चा
फाड़ पज्जमा होरी खेलो
जोगीरा सा रा रा रा ।
#happyholi
ले भगवा रंग पिचकारी में
मोदी घुस गये यूपी
भइया लाए लाल हरा
बुआ ले आईं नीला
पब्लिक दे गई एसो गच्चा
बुआ -भतीजे रंग गए भगवे में
जोगीरा सा रा रा रा ।
पब्लिक यूपी की दे गई गच्चा
राजा बन गये मोदी चच्चा
अखिलेश से नाराज हैं चच्चा
फाड़ पज्जमा होरी खेलो
जोगीरा सा रा रा रा ।
#happyholi
Friday, 24 February 2017
Tuesday, 14 February 2017
हैप्पी happy valentine day
ये वेलेंटाइन डे उन सब के नाम जिन्होंने एकतरफा मोहब्बत की , न कभी कह पाये न कभी सुन पाये खुद का नाम उससे । जो प्यार में मुकाम पा गए वो शायद सुकून में हों । लेकिन जो कह ही नहीं पाये वो जिस बैचेनी में जिए वो ताउम्र साथ रहती है उम्र के किसी पड़ाव पर उसका चेहरा दिखा या सामना हुआ , हर बार बही पहले वाली धकधक महसूस की । ये ऐसी बैचेनी है जो हमेशा साथ रहती है ऐसी एकतरफा मोहब्बत में कोई उम्मीद नहीं होती कि वो कुछ हमारे लिए करें इसका मतलब ये नहीं कि इसमें सिर्फ नउम्मीद ही है इसलिए जब कोई उम्मीद नहीं तो उसके पूरा होने या टूटने का डर भी नहीं । हो सकता है एकतरफा मोहब्बत वालों को कोई लूजर कहे , हारा हुआ कहे । लेकिन एकतरफा मोहब्बत में जीना कोई आसान नहीं । एक कसक तो हमेशा साथ रहती है एक बैचेनी हमेशा साथ रहती है जो आपको हमेशा प्यार में डुबोये रहती है आँखे खुली हो या बंद ! वो हमेशा सिर्फ आँखों में ही रहते हैं और अगर सामना हो जाये तो फिर तो दिन बन जाता है राते बैचेन हो जाती है और सच में यही कसक और बैचेनी हमेशा प्यार में डुबोये रहती है दुनिया में कोई ऐसा नहीं जिसने किसी से एकतरफा प्यार न किया हो , इस लिए अगर आप भी किसी ऐसे दौर में हैं तो खुद को अभागा न समझिये , आपने जिंदगी की सबसे कठिन लम्हो को जिया है । जो मुकाम पा गए वो उलझ गए लेकिन आप हमेशा खुश रहे खुद में ! अपनी दुनिया में ! जहाँ आप हैं और सिर्फ आपके वेलेंटाइन !!
सबको ये मोहब्बत का दिन मुबारक !!!
पीयूष मिश्रा की कुछ लाइने इश्क़ के नाम
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिस इश्क़ का चर्चा घर पे हो…
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना दूर तहलका हो…
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना बात बिगड़ती हो…
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो आसानी से हो जाए…
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना मौक़ा सिसकी का…
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसकी दरकार इजाज़त हो…
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो कहे ‘चूम और भग ले बे’…
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो मजबूरी का मौक़ा हो…
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें सब कुछ ही मीठा हो…
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो सबकी सुन के होता हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो ना भीगा ना झीना हो…
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो इक चुम्बन में थकता हो…
Friday, 10 February 2017
चुनाव में वोटों का असल आधार
उत्तर प्रदेश में पहले चरण के चुनाव की तिथि अब बस एक दिन बाद है पहले चरण में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ७२ सीटों पर
चुनाव होने वाले है । सभी पार्टियों ने अपने चुनाव प्रचार में खास तौर पर बड़े नेताओं के भाषणों में विकास , कानूनव्यबस्था मुद्दा रहता है और रहा है , अब सवाल यही है कि क्या वास्तव में जनता के बीच इन मुद्दों का असर है जब पत्रकार माइक और कैमरा के सामने जनता से पूछते हैं तो जनता भी चतुर राजनेता की तरह इन्ही मुद्दों की बात करती है लेकिन हकीकत तो इससे परे है मैं उत्तरप्रदेश के बारे में कह सकता हूँ कि चुनाव सिर्फ विकास और कानून व्यवस्था के मुद्दों पर नहीं लड़े जाते और न ही जनता इन मुद्दों के आधार पर वोट देती है पूरे प्रदेश में एक आम सहमति के तौर पर हमें लग सकता कि इस बार किसकी हवा है लेकिन जब आप प्रत्येक विधानसभा स्तर पर आंकलन करें तो समीकरण अलग है लोकल स्तर पर चुनाव लड़ने दो ही मुख्य आधार है एक जाति और धर्म के आधारपर गोलबंदी और दूसरा कि उस विधायक ने पाँच साल ,जनता को थाने , तहसील और जिले के प्रशासन के जरिये कितना ठगा या नहीं ठगा । उत्तर प्रदेश के कई विधानसभा इलाको में मोहल्ले और गाँव स्तर पर नेता होतें है जो विधायक , जनता और प्रशासन के बीच कैरियर का काम करते हैं थानों ,तहसीलों , सरकारी दफ्तरों में जनता को बिना मिठाई दिए घुसने का मौका नहीं मिलता , आप थाने में जाइये आपकी रिपोर्ट नहीं लिखी जाएगी फिर अपने मौहल्ले नेता से मिलिए वो विधायक जी से बात करेगा , आपके साथ होने दावा करेगा थाने में आपको दरोगा जी का भय दिखायेगा और मेज के नीचे से आपकी जेब ढीली होगी , दरअसल दिक्कत यही है ये मौहल्ले और गावँ स्तर के कहने से ही कम पढ़ी लिखी जनता वोट भी पर देती है इस चुनाव के दौरान मैं कई ऐसे लोगो से मिला जिनका यही कहना होता है कि हम तो फलां भाई के कहने पर वोट देंगे जहाँ वो जायेंगे वहीँ हम . अब जब हमने अपनी हक़ की लड़ाई के लिए ऐसे ठेकेदार चुने हैँ तब किसी न्याय की उम्मीद करना बेमानी ही है
दूसरा आधार है जाति और धर्म क़ी गोलबंदी , आप लोकल स्तर पर बात कीजिये लोग यही कहते हुए मिलेंगे क़ी हम तो अपने जाति के भाई या धर्म वाले को वोट देंगे , तो सवाल यही कि जब जनता और नेता चुनाव में इन्ही आधारों पर वोट देते तब ये विकास का ढकोसला क्यूँ है और दूसरा ये कि इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है इसकी जिम्मेदारी नेताओं पर तो है ही साथ हम आम लोगो क़ी भी है हमारा नेताओं और अधिकारियों के प्रति नजरिया क्या है क्या हम उनकी प्रति हुजूरी का भाव रखते हैँ हाँ हम ऐसा ही भाव रखते हैँ जबकि भारत के लोकतान्त्रिक ढांचे में कतई स्वीकार नहीं है हम नेताओं से सवाल नहीं करते , हम उनसे नहीं पूछते कि आपने जो वादे किये उनका क्या हुआ , हम उनसे नहीं पूछते कि आप लोकतंत्र क़ी प्रक्रियाओं का पालन क्यूँ नहीं करते , और यही कारण है कि हमारा हर स्तर पर शोषण होता है प्राइमरी शिक्षा , गाँव का विकास सबका बुरा हाल है चुनाव के समय नेता आता है हम उसके जयकारे लगाते हैँ मालाएं पहनाते हैँ और जाति -धर्म के हिसाब से वोट दे आते हैँ और अगर हम में से कोई उस सब का विरोध करना चाहे , सवाल पूछना चाहे तो खुद ही उसको दोषी ठहरा कर नेताओं को आसान सा रास्ता दे देते हैँ गौर से देखिये हम चुनावों में नारे भी वही लगाते तो पार्टियां तय करती है जब तक हमारे नारों में जिन्दावाद और जय जयकार रहेगा हम ऐसे ठगे जातें रहेंगे , हमें चटुकारिता और सामंती नारों क़ी नहीं नेताओं से सवाल करने क़ी जरूरत है जिस दिन ये हो जायेगा हम इस पवित्र लोकतंत्र क़ी आत्मा के साथ न्याय कर पाएंगे , सबको सबका हक़ उसी दिन मिलेगा जब जिंदावाद के नारों क़ी जगह सवाल होंगे ...
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