Monday, 13 March 2017

ले भगवा रंग पिचकारी में मोदी घुस गये यूपी

इस होली पे थोड़ी राजनीतिक चुहल के साथ सबको होली मुबारक .. मजे लीजिये इन लाइनों का और साथ में होली का ...

ले भगवा रंग पिचकारी में
मोदी घुस गये यूपी
भइया लाए लाल हरा
बुआ ले आईं नीला
पब्लिक दे गई एसो गच्चा
बुआ -भतीजे रंग गए भगवे में
जोगीरा सा रा रा रा ।

पब्लिक यूपी की दे गई गच्चा
राजा बन गये मोदी चच्चा
अखिलेश से नाराज हैं चच्चा
फाड़ पज्जमा होरी खेलो
जोगीरा सा रा रा रा ।

#happyholi

Friday, 24 February 2017

अरे ओ भोले भंडारी !



अरे ओ भोले भंडारी !
तुम्हारी माया है न्यारी !
लौंडे हुये जायें भंगारी !
लड़कियाँ माँगे पति संस्कारी !

धन्नासेठ चढ़ावें छत्तर !
निर्धन के पास बस पातर !
जहर दुनिया में भर आया !
कहाँ ढूढें तुमको कैलाशी !
अरे ओ भोले भंडारी !
तुम्हारी माया है न्यारी !

#महाशिव_रात्रि

Tuesday, 14 February 2017

हैप्पी happy valentine day



ये वेलेंटाइन डे उन सब के नाम जिन्होंने एकतरफा मोहब्बत की , न कभी कह पाये न कभी सुन पाये खुद का नाम उससे । जो प्यार में मुकाम पा गए वो शायद सुकून में हों । लेकिन जो कह ही नहीं पाये वो जिस बैचेनी में जिए वो ताउम्र साथ रहती है उम्र के किसी पड़ाव पर उसका चेहरा दिखा या सामना हुआ , हर बार बही पहले वाली धकधक महसूस की । ये ऐसी बैचेनी है जो हमेशा साथ रहती है ऐसी एकतरफा मोहब्बत में कोई उम्मीद नहीं होती कि वो कुछ हमारे लिए करें इसका मतलब ये नहीं कि इसमें सिर्फ नउम्मीद ही है इसलिए जब कोई उम्मीद नहीं तो उसके पूरा होने या टूटने का डर भी नहीं । हो सकता है एकतरफा मोहब्बत वालों को कोई लूजर कहे , हारा हुआ कहे । लेकिन एकतरफा मोहब्बत में जीना कोई आसान नहीं । एक कसक तो हमेशा साथ रहती है एक बैचेनी हमेशा साथ रहती है जो आपको हमेशा प्यार में डुबोये रहती है आँखे खुली हो या बंद ! वो हमेशा सिर्फ आँखों में ही रहते हैं और अगर सामना हो जाये तो फिर तो दिन बन जाता है राते बैचेन हो जाती है और सच में यही कसक और बैचेनी हमेशा प्यार में डुबोये रहती है दुनिया में कोई ऐसा नहीं जिसने किसी से एकतरफा प्यार न किया हो , इस लिए अगर आप भी किसी ऐसे दौर में हैं तो खुद को अभागा न समझिये , आपने जिंदगी की सबसे कठिन लम्हो को जिया है । जो मुकाम पा गए वो उलझ गए लेकिन आप हमेशा खुश रहे खुद में ! अपनी दुनिया में ! जहाँ आप हैं और सिर्फ आपके वेलेंटाइन !!

सबको ये मोहब्बत का दिन मुबारक !!!

पीयूष मिश्रा की कुछ लाइने इश्क़ के नाम

वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिस इश्क़ का चर्चा घर पे हो…


वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना दूर तहलका हो…

वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना बात बिगड़ती हो…


वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो आसानी से हो जाए…


वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना मौक़ा सिसकी का…

वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसकी दरकार इजाज़त हो…


वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो कहे ‘चूम और भग ले बे’…

वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो मजबूरी का मौक़ा हो…


वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें सब कुछ ही मीठा हो…


वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो सबकी सुन के होता हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो ना भीगा ना झीना हो…

वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो इक चुम्बन में थकता हो…



Friday, 10 February 2017

चुनाव में वोटों का असल आधार






उत्तर प्रदेश में पहले चरण के चुनाव की तिथि अब बस एक दिन बाद है  पहले चरण में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ७२ सीटों पर
चुनाव होने वाले है । सभी पार्टियों ने अपने चुनाव प्रचार में खास तौर पर बड़े नेताओं के  भाषणों में विकास , कानूनव्यबस्था मुद्दा रहता है और रहा है , अब सवाल यही है कि क्या वास्तव में जनता के बीच इन मुद्दों का असर है जब पत्रकार माइक और कैमरा के सामने जनता से पूछते हैं तो जनता भी चतुर राजनेता की तरह इन्ही मुद्दों की बात करती है लेकिन हकीकत तो इससे परे है  मैं उत्तरप्रदेश के बारे में कह सकता हूँ कि चुनाव सिर्फ विकास और कानून व्यवस्था के मुद्दों पर नहीं लड़े जाते और न ही जनता इन मुद्दों के आधार पर वोट देती है पूरे प्रदेश में एक आम सहमति के तौर पर हमें लग सकता कि इस बार किसकी हवा है लेकिन जब आप प्रत्येक  विधानसभा स्तर पर आंकलन करें तो समीकरण अलग है लोकल स्तर पर चुनाव लड़ने दो ही मुख्य आधार है एक जाति और धर्म के आधारपर गोलबंदी और दूसरा कि उस विधायक ने पाँच साल ,जनता को थाने , तहसील और जिले के प्रशासन के जरिये कितना ठगा या नहीं ठगा । उत्तर प्रदेश के कई विधानसभा इलाको में  मोहल्ले और गाँव  स्तर पर नेता होतें है जो विधायक , जनता और प्रशासन के बीच कैरियर का काम करते हैं थानों ,तहसीलों , सरकारी दफ्तरों में जनता को बिना मिठाई दिए घुसने का मौका नहीं मिलता , आप थाने में जाइये आपकी रिपोर्ट नहीं लिखी जाएगी फिर अपने मौहल्ले नेता से मिलिए वो विधायक जी से बात करेगा , आपके साथ होने दावा करेगा थाने में आपको  दरोगा जी का भय दिखायेगा और मेज के नीचे से आपकी जेब ढीली होगी , दरअसल दिक्कत यही है ये मौहल्ले और गावँ स्तर के कहने से ही  कम पढ़ी लिखी जनता वोट भी पर देती है इस चुनाव के दौरान मैं कई ऐसे लोगो से मिला जिनका यही कहना होता है कि हम तो फलां भाई के कहने पर वोट देंगे जहाँ वो जायेंगे वहीँ हम . अब जब हमने अपनी हक़ की लड़ाई के लिए ऐसे  ठेकेदार चुने हैँ तब किसी न्याय की उम्मीद करना बेमानी ही है

दूसरा आधार है जाति और धर्म क़ी गोलबंदी , आप लोकल स्तर पर बात कीजिये लोग यही कहते हुए मिलेंगे क़ी हम तो अपने जाति के भाई या धर्म वाले को वोट देंगे , तो सवाल यही कि जब जनता और नेता चुनाव में इन्ही आधारों पर वोट देते तब ये विकास का ढकोसला क्यूँ है और दूसरा ये कि इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है इसकी जिम्मेदारी नेताओं पर तो है ही साथ हम आम लोगो क़ी भी है हमारा नेताओं और अधिकारियों के प्रति नजरिया क्या है क्या हम उनकी प्रति हुजूरी का भाव रखते हैँ हाँ हम ऐसा ही भाव रखते हैँ जबकि भारत के लोकतान्त्रिक ढांचे में कतई स्वीकार नहीं है हम नेताओं से सवाल नहीं करते , हम उनसे नहीं पूछते कि आपने जो वादे किये उनका क्या हुआ , हम उनसे नहीं पूछते कि आप लोकतंत्र क़ी प्रक्रियाओं का पालन क्यूँ  नहीं करते , और यही कारण है कि हमारा हर स्तर पर शोषण होता है प्राइमरी शिक्षा , गाँव का विकास सबका बुरा हाल है चुनाव के समय नेता आता है हम उसके जयकारे लगाते हैँ मालाएं पहनाते हैँ और जाति -धर्म के हिसाब से वोट दे आते हैँ और अगर हम में से कोई उस सब का विरोध करना चाहे , सवाल पूछना चाहे तो खुद ही उसको दोषी ठहरा कर नेताओं को आसान सा रास्ता दे देते हैँ गौर से देखिये हम चुनावों में नारे भी वही लगाते तो पार्टियां तय करती है जब तक हमारे नारों में जिन्दावाद और जय जयकार रहेगा हम ऐसे ठगे जातें रहेंगे , हमें चटुकारिता और सामंती नारों क़ी नहीं नेताओं से सवाल करने क़ी जरूरत है जिस दिन ये हो जायेगा हम इस पवित्र लोकतंत्र क़ी आत्मा के साथ  न्याय कर पाएंगे , सबको सबका हक़ उसी दिन मिलेगा जब जिंदावाद के नारों क़ी जगह सवाल होंगे ...

Thursday, 9 February 2017

#असफलता_के_दिन





असफलता और निराशा से घिरे कठिन दिनों में कई बार अपनी योग्यता एवं अर्जित ज्ञान पर शक होने लगता है । कई बार ये भी लगता है ये जो रास्ता हमने पकड़ा है क्या ये सही है ? क्या ये रास्ता ऐसा है जो हरबार इस भ्र्म में डालता रहेगा की आप गलत दिशा में हैं जवकि इसे आपने खुद चुना है या परिस्थितिवश । ऐसे में व्यक्ति का खुद को प्रोत्साहित करना बहुत काम आता है हालांकि ऐसे दिनों में आत्म विश्वाश की घोर कमी हो जाती है । दरअसल यही जीवन की सीख है जो अगर टिके रहो तो मजबूत बनाती है हमें ख़ुद को प्रोत्साहित करते रहना चाहिए । बात बनेगी ! अंधेरा छटेगा ! रास्ता मिलेगा! ये न सही कुछ और होगा ! चलते रहे तो कहीं उजाले में पहुँच ही जायेंगे ! ये सब खुद से कहते रहो , जो रास्ता बंद हुआ उसके बाद नया ढूढने की कोशिश , बस इसी सब में कट जायेगी जिंदगानी , फिर बाद में एक दिन बैठो और सोचो कि मैं कितना लड़ा लेकिन हारा नहीं , थका, लेकिन रुका नहीं , आप देखिये ख़ुद को कितना सुकून और अगले पड़ाव की तरफ बढ़ने का साहस मिलता है ....

Sunday, 8 January 2017

वो मेरे सपनो में अब भी आती है



वो मेरे सपनो में अब भी आती है
मेरी जान मुझको यूँ सताती है
जब भी सोता हूँ यूँ जगाती है
दिल में बैचैनी भर जाती है
मैं हर उसके सपने को झुठलाता हूँ
वो हर रोज बंद आँखों में हकीकत सी बन जाती है
वो मिलना छिपके गलियों में
इजहारे-ऐ इश्क़ आँखों आँखों में
पुराने हुए खत को नया सा पढ़ना यूँ
किसी ने देखा तो नहीं ,  धुक धुकी दिल में
मुझसे फिर इश्क़ में जवां कर जाती है
गुजरे लम्हों से ये आलिंगन मेरा
वो खुद की डोर मुझसे जोड़ जाती है
वो मेरे सपनो में अब भी आती है
मेरी जान मुझको यूँ सताती है

--------निशान्त

Thursday, 22 December 2016

ठहराब मिले

है ? कोई रास्ता जो मुक़ाम तक जाता हो
है ? कोई दरवाजा जो बन्द रास्ते को खोलता हो
कब तक अपनी बैचेनी से लड़ूँ
कब तक हताशा से लड़ूँ
कबतक चाहतों से लड़ूँ
है ? कोई पेड़ जहाँ थोड़ी छाँव मिले
है ? कोई कोना जहाँ गुनगुनी धूप मिले
सुकून सी मीठी चाय की प्याली मिले
एक ऐसा मुक़ाम मिले जो आखिरी हो
कुछ नही बस मुझे मेरे मन का ठहराब मिले

―निशान्त

Wednesday, 16 November 2016

14 नवम्बर-बातें चाचा नेहरू की

14 नवम्बर हर बार की तरह इस बार भी बातें चाचा नेहरू की , उनके दृष्टिकोण की, देश के बनने में उनके योगदान की । ये सब हर बार की तरह है और अब तो तमाम लोग उन्हें राजनीतिक पार्टियों के गंदे अखाड़े में खींच लाते हैं राजनीतिक पार्टियों के अपने उद्देश्य हो सकते हैं लेकिन हम !! हमारा क्या उद्देश्य है ? और क्या होना चाहिए ? क्या हम ऐसे स्वप्नद्रष्टा को उनकी सोच को गंगा में बहा कर मुर्ख हो जायें जिसने इस आधुनिक भारत की नींव डाली , जो युवा है उनमे से कई पिता भी होंगे , कोई पिता नहीं तो भाई, चाचा कुछ न कुछ होगा ही , आप अपने बच्चो को इस दुनिया से इस देश से कैसे परिचित करवाते हैं बहुत से किड्स स्कुल के हवाले कर देते होंगे , कुछ कहते है भारत महान देश है, इसके प्रधानतमंत्री वो थे ! अब ये हैं फलाँ ये फलां वो, और कुछ तो इन दोनों में से कुछ नहीं कर पातें होंगे , कुछ तो अशिक्षित हैं उनसे क्या शिकायत लेकिन जो पढ़े लिखे हैं वे ?
इंसान कुछ खुद रचता है और कुछ रचे हुए से सीखता है पंडित नेहरू ने अपनी पुत्री प्रियदर्शनी इंद्रा को उनकी पढाई के वक्त कई पत्र लिखे , इन पत्रों में दुनिया का , इस देश की सभ्यता और जीवन का सार लिखा है हम में से कितने लोग होंगे जिन्होंने इन पत्रों को पढ़ा भी होगा , शायद कुछ ने पढ़ा हो, लेकिन काफी हैं जो इससे दूर हैं आने वाली पीढ़ी को हम कैसा समाज, विश्व और देश में प्रस्तुत करेंगे ये हमारे ऊपर है देश में बाल मजदूरी के जो आंकड़े हैं उनसे मुँह मोड़ लें कुछ लोगों के लिए व्यक्तिगत रूप से ये आसान है― हमें क्या ?
होने दो हमारा बच्चा तो सेफ है। सोच बदलिए । खुद को राजनीतिक अखाड़ो से दूर रख के समझ को विकसित कीजिये, नेहरू को उनके लिए न अपने लिए ही सही लेकिन पढ़िए उन्हें समझिये ।
एक हाथ तो उठाइये जो हम इस देश में बेहतर कल आने वाली पीढ़ी को दे सकें । हर बच्चा अपने बेहरत जीवन को जिये, बेहरत सोच के साथ इस देश और दुनिया को समझे , ये सब तभी होगा जब हम समझ रखते होंगे , इस लिए चाचा नेहरू को भुलाये मत, फोटोशॉप के भृम में खुद पागल मत बनाइये , जाइये कितावों में हकीकत पढ़िए उसे जीवन में उतारिये , ध्यान रखिए पौधा जैसे पोषित किया जायेगा वो बैसे ही फल देगा ।।

Friday, 30 September 2016

तुम आए हो तुम्हें भी आज़मा कर देख लेता हूँ -अहमद मुश्ताक़





तुम आए हो तुम्हें भी आज़मा कर देख लेता हूँ
तुम्हारे साथ भी कुछ दूर जा कर देख लेता हूँ

हवाएँ जिन की आँधी खिड़कियों पर सर पटकती हैं
मैं उन कमरों में फिर शमएँ जला कर देख लेता हूँ

अजब क्या इस क़रीने से कोई सूरत निकल आए
तेरी बातों को ख़्वाबों से मिला कर देख लेता हूँ

सहर-दम किरचियाँ टूटे हुए ख़्वाबों की मिलती हैं
तो बिस्तर झाड़ कर चादर हटा कर देख लेता हूँ

बहुत दिल को दुखाता है कभी जब दर्द-ए-महजूरी
तेरी यादों की जानिब मुस्कुरा कर देख लेता हूँ

उड़ा कर रंग कुछ होंटों से कुछ आँखों से कुछ दिल से
गए लम्हों को तस्वीरें बना कर देख लेता हूँ

नहीं हो तुम भी वो अब मुझ से यारो क्या छिपाओगे
हवा की सम्त को मिट्टी उड़ा कर देख लेता हूँ

सुना है बे-नियाज़ी ही इलाज-ए-ना-उम्मीदी है
ये नुस्ख़ा भी कोई दिन आज़मा कर देख लेता हूँ

मोहब्बत मर गई ‘मुश्ताक़’ लेकिन तुम न मानोगे
मैं ये अफ़वाह भी तुम को सुना कर देख लेता हूँ
 -------अहमद मुश्ताक़

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Monday, 15 August 2016

70वीं आजादी मुबारक





लालकिले के प्राचीर से देश के प्रधानमंत्रियों का चुनावी भाषण मुझे आजतक समझ नहीं आया , अपनी अपनी बनाई योजनाएं बताने लगते है करें भी क्या गांठ में है ही इतना, गुलाम भी हम खुद हुए और आजाद भी खुद ही हुये, हाँ आजादी के बाद इतना तो जरूर हुआ की हम एक हो गए, लेकिन उस एकता के बंडल को कोई तोड़ देना चाहता है तो कोई इस बंडल से खुद ही अलग होना चाहता है
 हमनें अपना संविधान बनाया, जिसने हमें हमारे अधिकार दिए, लेकिन  इस सब के बाबजूद हम आज भी सिस्टम से लड़ रहे है सामाजिक समस्याओं से लड़ाई जारी है जाति, धर्म , आर्थिक, लैंगिंग ,   जमीन ,जल , जंगल की लड़ाई तो अब भी चल रही है
लेकिन इस सब बाद भी ये दिन हमें एकता का एहसास करा देता है एक झंडे के तले खड़े होकर कम से कम हम एक साथ होते है जरूरत है इस भावना को हमेशा साथ रखने की । सत्तर साला आजादी तक आते आते हमनें कई मुकाम हासिल किये है और भी आगे करते रहेंगे, लेकिन साथ साथ हमें ऐसा समाज और विचार व्यबस्था विकसित करनी होगी, जहाँ लोग एक दूसरे को सुने और समझे , एक दूसरे पीड़ा को समझे , उनकी मज़बूरी का इस्तेमाल न करें , एक दूसरे के लिए जियें , देश का आर्थिक और सामरिक विकास अपनी जगह है सामाजिक विकास का क्या हो , इसके बिना सभी विकास बेमानी है आजादी साल दर साल उम्रदराज होती जा रही है और उसके नायकों के विचार सिर्फ अब नारों में बचें हैं और नारे भी खोखले हैं इस लिए कोशिश कीजिये ये आजादी हमसे बिसरे नहीं है जब मिली है तो देश के अंतिम आदमी तक को मिले तब इस जश्न का असली आनंद होगा है
आप सब को ये 70वीं आजादी मुबारक
जय हिंद !!!

Thursday, 11 August 2016

यारों की यारी के नाम




सबसे मुश्किल है यारी को निभाना
निभ जाये फिर इससे मुड़ जाना

सबसे मुश्किल है यारी में जीना
जी जाएं फिर मर जाना

ये रिश्ता बिना बोझ का है
मुश्किल है बोझिल कर देना

दिल की बातें कहने में
यारों से कैसा शर्माना

ये एहसास भी अच्छा है
कह कर फिर न झुठलाना

यारी रिश्ता बस सच का है
झूट से इसको ढह जाना

-------यारों की यारी के नाम

Tuesday, 19 July 2016

तुम्हे याद है वो आखिरी बार मिलना




तुम्हे याद है वो आखिरी बार  मिलना
तुम्हारी  आँखों से झरते आंसू
मेज पे टपक कर मेरे आंसू से जा मिले थे
और मैंने कांपते हाथो से तुम्हे अलविदा कहा था
तुम्हारे जाने के बाद घंटो तुम्हे रोकने का जतन सोचता रहा
रुकना तो तुम भी चाहते थे
आज तुम फिर मिले हो उसी मेज पर
फ़र्क़ ये है न आज आंसू है न कांपते हाथ
न बैचेनी है न चेहरे पर शिकन हैं
बस गुजरे वक्त की कहानी है
और ..... तुम्हारी बातों में बेफिक्री है
मेरे हाथो की तरफ देखो
ये तुम्हारे हाथो को छूने को कहते हैं
तुम्हे रोक लेने को कहते हैं
और मैं फिर से कोई बहाना ढूढ़ रहा हूँ

                 ...............निशान्त

Friday, 8 July 2016

ईद पर यार की याद !!

ये बात उन दिनों की है जब में दर्जा 2 में पढता था, मुहल्ले में ही एक छोटा सा स्कूल था जिसमे मुझे अक्सर मेरे पिता और कभी कभी बड़ी बहन साथ पहुँचाने आती थी, स्कूल में अपना एक यार था शाहनवाज | था क्या वो तो अब भी कहीं होगा मगर कई सालो से उसकी खवर नहीं }खेर कहानी कुछ ये कि वो अपना इकलौता और पक्का यार था मुझसे कई गुना तहजीव वाला खास कर बोलचालमें। उसके अब्बा और अम्मी बचपन मतलब उसके पैदा होने के कुछ दिन बाद ही गुजर गए , चाचा और चाची ने उसे पाला- पोसा 

हमारे उस मोहल्ले में एक मस्जिद थी जिसके परकोटे में शकरकंद की फसल हुआ करती , दोपहर को अक्सर मैं और शाहनवाज उस परकोटे को कूद के शकरकंद उखाड़ने जाया करते थे।मैं तो डरता था लेकिन वो हिम्मती था । एक बार मौलवी साहब ने देख लिया । बहुत दूर तक खदेड़ा लेकिन हम उनके हाथ नहीं आये, उसके बाद मैं कभी उधर नहीं गया। ईद आने के कई दिन पहले से वो मेरी माँ से जिद करता था की मुझे ईद पर उसके घर जाने दे । ईद के दिन सुबह की नमाज के बाद वो मुझे लिवाने आता और हम दोनों सबसे पहले मीठे चावल और गोले की खुरचन खाया करते थे बहुत घूमते थे पूरे टोले में न जाने किस किस के घर ....

ये खुशनुमा दौर कई साल चला । हम उस मोहल्ले को छोड़ कर 2 किलोमीटर दूर दूसरे मुहल्ले में अपने खुद के मकान में आगये फिर वो स्कूल भी छूट गया ।लेकिन शाहनवाज का साथ नहीं छूटा वो मुझे अपनी साईकिल पे बिठा के ईद के दिन अपने घर ले जाया करता था । 

माँ अक्सर मुझे उसके बोलने के तरीके पर उलाहना देती थी देख शाहनवाज कैसे अच्छा बोलता है और तू अभी तक गाँव की बोली बोलता है मेरी भाषा में सुधार उसी की बजह से आया । वक्त बढ़ता रहा हम दर्जा दर दर्जा पढाई में आगे बढे और शाहनवाज पढाई छोड़ कर अलीगढ़ रोजगार के लिए टेलर की दुकान पर चला गया। कई साल वो बापिस नहीं आया फिर जब में दर्जा 10 में था तब वो एक बार ईद पर आया और इस बार मैं अपनी साईकिल से उसके घर गया वही पुराने दिन फिर से जिए वो फिर बापिस गया और 2-3 साल तक कोई खवर नहीं मिली वो जमाना फेसबुक का नहीं था हमारे पास तो फोन भी नहीं था सो खवर मिलने का ऐसा कोई जरिया नहीं था |

एक दिन जब में बरेली से अपने घर आया तो खबर माँ ने बताया शाहनवाज आया था तेरा नंबर ले गया है (अब मेरे पास एक रिलायन्स का फोन आगया था) मुझे उस दिन बड़ी ख़ुशी हुई । यारी होती ही ऐसी है जिसमे दुरी बड़ी खलती है खेर अगले दिन वो आया । हम गले मिले हालचाल लिए और उसने अपनी जिंदगी की हालात वयां की । भाई की शादी हो चुकी थी और अपनी टेलरी की दुकान भी हो गई थी । और यहाँ हम अभी पढ़ ही रहे थे । मेने कहा यार बड़ी जल्दी ? वो मुस्कुरा के बोला क्या करू पढाई तो की नहीं । हालातों ने काम करना सीखा ही दिया , अब रिश्तेदारों ने जोर दिया तो ये भी कर ली 

हम खूब हँसे … हँसने से खलिश हल्की पड़ जाती है घंटों की ये मुलाकात बड़ी जल्दी बीत गई । वो चला गया और आज तक मुझे उसकी खबर नहीं है हालातों ने रिश्तों की डोर हलकी कर दी …
 उम्मीद है वो जहाँ है मजे से होगा । मुझे पता है इस तेज दुनिया में वो मुझे मिलेगा जरूर। अबके कुछ ऐसा करूँगा की इस डोर का एक धागा मेरे हाथ में रह जाये ताकि हर ईद को में उसे मुवारक कह सकूँ । मुझे बैसे तो उसकी याद नहीं आती लेकिन हर ईद को अनायास ही वो मुझे याद आजाता है बचपन में बने रिश्तों की छाप ऐसी ही होती है वो जब तब अपना रंग छोड़ ही देती है 
ईद की रात का आधा पहर बीत चूका है और मैं उन यादों को हमेशा के लिख के लिए रखने की कोशिश में लगा हूँ 
दोस्त तुम जहाँ भी हो तुम्हे ईद मुवारक !!


--- तुम्हारा नृपेंद्र 
( ये नाम दर्ज तीन तक रहा फिर दूसरे स्कूल में नाम निशान्त हुआ , लेकिन उसने मुझे हमेशा नृपेंद्र ही कहा )