Wednesday, 16 November 2016

14 नवम्बर-बातें चाचा नेहरू की

14 नवम्बर हर बार की तरह इस बार भी बातें चाचा नेहरू की , उनके दृष्टिकोण की, देश के बनने में उनके योगदान की । ये सब हर बार की तरह है और अब तो तमाम लोग उन्हें राजनीतिक पार्टियों के गंदे अखाड़े में खींच लाते हैं राजनीतिक पार्टियों के अपने उद्देश्य हो सकते हैं लेकिन हम !! हमारा क्या उद्देश्य है ? और क्या होना चाहिए ? क्या हम ऐसे स्वप्नद्रष्टा को उनकी सोच को गंगा में बहा कर मुर्ख हो जायें जिसने इस आधुनिक भारत की नींव डाली , जो युवा है उनमे से कई पिता भी होंगे , कोई पिता नहीं तो भाई, चाचा कुछ न कुछ होगा ही , आप अपने बच्चो को इस दुनिया से इस देश से कैसे परिचित करवाते हैं बहुत से किड्स स्कुल के हवाले कर देते होंगे , कुछ कहते है भारत महान देश है, इसके प्रधानतमंत्री वो थे ! अब ये हैं फलाँ ये फलां वो, और कुछ तो इन दोनों में से कुछ नहीं कर पातें होंगे , कुछ तो अशिक्षित हैं उनसे क्या शिकायत लेकिन जो पढ़े लिखे हैं वे ?
इंसान कुछ खुद रचता है और कुछ रचे हुए से सीखता है पंडित नेहरू ने अपनी पुत्री प्रियदर्शनी इंद्रा को उनकी पढाई के वक्त कई पत्र लिखे , इन पत्रों में दुनिया का , इस देश की सभ्यता और जीवन का सार लिखा है हम में से कितने लोग होंगे जिन्होंने इन पत्रों को पढ़ा भी होगा , शायद कुछ ने पढ़ा हो, लेकिन काफी हैं जो इससे दूर हैं आने वाली पीढ़ी को हम कैसा समाज, विश्व और देश में प्रस्तुत करेंगे ये हमारे ऊपर है देश में बाल मजदूरी के जो आंकड़े हैं उनसे मुँह मोड़ लें कुछ लोगों के लिए व्यक्तिगत रूप से ये आसान है― हमें क्या ?
होने दो हमारा बच्चा तो सेफ है। सोच बदलिए । खुद को राजनीतिक अखाड़ो से दूर रख के समझ को विकसित कीजिये, नेहरू को उनके लिए न अपने लिए ही सही लेकिन पढ़िए उन्हें समझिये ।
एक हाथ तो उठाइये जो हम इस देश में बेहतर कल आने वाली पीढ़ी को दे सकें । हर बच्चा अपने बेहरत जीवन को जिये, बेहरत सोच के साथ इस देश और दुनिया को समझे , ये सब तभी होगा जब हम समझ रखते होंगे , इस लिए चाचा नेहरू को भुलाये मत, फोटोशॉप के भृम में खुद पागल मत बनाइये , जाइये कितावों में हकीकत पढ़िए उसे जीवन में उतारिये , ध्यान रखिए पौधा जैसे पोषित किया जायेगा वो बैसे ही फल देगा ।।

Friday, 30 September 2016

तुम आए हो तुम्हें भी आज़मा कर देख लेता हूँ -अहमद मुश्ताक़





तुम आए हो तुम्हें भी आज़मा कर देख लेता हूँ
तुम्हारे साथ भी कुछ दूर जा कर देख लेता हूँ

हवाएँ जिन की आँधी खिड़कियों पर सर पटकती हैं
मैं उन कमरों में फिर शमएँ जला कर देख लेता हूँ

अजब क्या इस क़रीने से कोई सूरत निकल आए
तेरी बातों को ख़्वाबों से मिला कर देख लेता हूँ

सहर-दम किरचियाँ टूटे हुए ख़्वाबों की मिलती हैं
तो बिस्तर झाड़ कर चादर हटा कर देख लेता हूँ

बहुत दिल को दुखाता है कभी जब दर्द-ए-महजूरी
तेरी यादों की जानिब मुस्कुरा कर देख लेता हूँ

उड़ा कर रंग कुछ होंटों से कुछ आँखों से कुछ दिल से
गए लम्हों को तस्वीरें बना कर देख लेता हूँ

नहीं हो तुम भी वो अब मुझ से यारो क्या छिपाओगे
हवा की सम्त को मिट्टी उड़ा कर देख लेता हूँ

सुना है बे-नियाज़ी ही इलाज-ए-ना-उम्मीदी है
ये नुस्ख़ा भी कोई दिन आज़मा कर देख लेता हूँ

मोहब्बत मर गई ‘मुश्ताक़’ लेकिन तुम न मानोगे
मैं ये अफ़वाह भी तुम को सुना कर देख लेता हूँ
 -------अहमद मुश्ताक़

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Monday, 15 August 2016

70वीं आजादी मुबारक





लालकिले के प्राचीर से देश के प्रधानमंत्रियों का चुनावी भाषण मुझे आजतक समझ नहीं आया , अपनी अपनी बनाई योजनाएं बताने लगते है करें भी क्या गांठ में है ही इतना, गुलाम भी हम खुद हुए और आजाद भी खुद ही हुये, हाँ आजादी के बाद इतना तो जरूर हुआ की हम एक हो गए, लेकिन उस एकता के बंडल को कोई तोड़ देना चाहता है तो कोई इस बंडल से खुद ही अलग होना चाहता है
 हमनें अपना संविधान बनाया, जिसने हमें हमारे अधिकार दिए, लेकिन  इस सब के बाबजूद हम आज भी सिस्टम से लड़ रहे है सामाजिक समस्याओं से लड़ाई जारी है जाति, धर्म , आर्थिक, लैंगिंग ,   जमीन ,जल , जंगल की लड़ाई तो अब भी चल रही है
लेकिन इस सब बाद भी ये दिन हमें एकता का एहसास करा देता है एक झंडे के तले खड़े होकर कम से कम हम एक साथ होते है जरूरत है इस भावना को हमेशा साथ रखने की । सत्तर साला आजादी तक आते आते हमनें कई मुकाम हासिल किये है और भी आगे करते रहेंगे, लेकिन साथ साथ हमें ऐसा समाज और विचार व्यबस्था विकसित करनी होगी, जहाँ लोग एक दूसरे को सुने और समझे , एक दूसरे पीड़ा को समझे , उनकी मज़बूरी का इस्तेमाल न करें , एक दूसरे के लिए जियें , देश का आर्थिक और सामरिक विकास अपनी जगह है सामाजिक विकास का क्या हो , इसके बिना सभी विकास बेमानी है आजादी साल दर साल उम्रदराज होती जा रही है और उसके नायकों के विचार सिर्फ अब नारों में बचें हैं और नारे भी खोखले हैं इस लिए कोशिश कीजिये ये आजादी हमसे बिसरे नहीं है जब मिली है तो देश के अंतिम आदमी तक को मिले तब इस जश्न का असली आनंद होगा है
आप सब को ये 70वीं आजादी मुबारक
जय हिंद !!!

Thursday, 11 August 2016

यारों की यारी के नाम




सबसे मुश्किल है यारी को निभाना
निभ जाये फिर इससे मुड़ जाना

सबसे मुश्किल है यारी में जीना
जी जाएं फिर मर जाना

ये रिश्ता बिना बोझ का है
मुश्किल है बोझिल कर देना

दिल की बातें कहने में
यारों से कैसा शर्माना

ये एहसास भी अच्छा है
कह कर फिर न झुठलाना

यारी रिश्ता बस सच का है
झूट से इसको ढह जाना

-------यारों की यारी के नाम

Tuesday, 19 July 2016

तुम्हे याद है वो आखिरी बार मिलना




तुम्हे याद है वो आखिरी बार  मिलना
तुम्हारी  आँखों से झरते आंसू
मेज पे टपक कर मेरे आंसू से जा मिले थे
और मैंने कांपते हाथो से तुम्हे अलविदा कहा था
तुम्हारे जाने के बाद घंटो तुम्हे रोकने का जतन सोचता रहा
रुकना तो तुम भी चाहते थे
आज तुम फिर मिले हो उसी मेज पर
फ़र्क़ ये है न आज आंसू है न कांपते हाथ
न बैचेनी है न चेहरे पर शिकन हैं
बस गुजरे वक्त की कहानी है
और ..... तुम्हारी बातों में बेफिक्री है
मेरे हाथो की तरफ देखो
ये तुम्हारे हाथो को छूने को कहते हैं
तुम्हे रोक लेने को कहते हैं
और मैं फिर से कोई बहाना ढूढ़ रहा हूँ

                 ...............निशान्त

Friday, 8 July 2016

ईद पर यार की याद !!

ये बात उन दिनों की है जब में दर्जा 2 में पढता था, मुहल्ले में ही एक छोटा सा स्कूल था जिसमे मुझे अक्सर मेरे पिता और कभी कभी बड़ी बहन साथ पहुँचाने आती थी, स्कूल में अपना एक यार था शाहनवाज | था क्या वो तो अब भी कहीं होगा मगर कई सालो से उसकी खवर नहीं }खेर कहानी कुछ ये कि वो अपना इकलौता और पक्का यार था मुझसे कई गुना तहजीव वाला खास कर बोलचालमें। उसके अब्बा और अम्मी बचपन मतलब उसके पैदा होने के कुछ दिन बाद ही गुजर गए , चाचा और चाची ने उसे पाला- पोसा 

हमारे उस मोहल्ले में एक मस्जिद थी जिसके परकोटे में शकरकंद की फसल हुआ करती , दोपहर को अक्सर मैं और शाहनवाज उस परकोटे को कूद के शकरकंद उखाड़ने जाया करते थे।मैं तो डरता था लेकिन वो हिम्मती था । एक बार मौलवी साहब ने देख लिया । बहुत दूर तक खदेड़ा लेकिन हम उनके हाथ नहीं आये, उसके बाद मैं कभी उधर नहीं गया। ईद आने के कई दिन पहले से वो मेरी माँ से जिद करता था की मुझे ईद पर उसके घर जाने दे । ईद के दिन सुबह की नमाज के बाद वो मुझे लिवाने आता और हम दोनों सबसे पहले मीठे चावल और गोले की खुरचन खाया करते थे बहुत घूमते थे पूरे टोले में न जाने किस किस के घर ....

ये खुशनुमा दौर कई साल चला । हम उस मोहल्ले को छोड़ कर 2 किलोमीटर दूर दूसरे मुहल्ले में अपने खुद के मकान में आगये फिर वो स्कूल भी छूट गया ।लेकिन शाहनवाज का साथ नहीं छूटा वो मुझे अपनी साईकिल पे बिठा के ईद के दिन अपने घर ले जाया करता था । 

माँ अक्सर मुझे उसके बोलने के तरीके पर उलाहना देती थी देख शाहनवाज कैसे अच्छा बोलता है और तू अभी तक गाँव की बोली बोलता है मेरी भाषा में सुधार उसी की बजह से आया । वक्त बढ़ता रहा हम दर्जा दर दर्जा पढाई में आगे बढे और शाहनवाज पढाई छोड़ कर अलीगढ़ रोजगार के लिए टेलर की दुकान पर चला गया। कई साल वो बापिस नहीं आया फिर जब में दर्जा 10 में था तब वो एक बार ईद पर आया और इस बार मैं अपनी साईकिल से उसके घर गया वही पुराने दिन फिर से जिए वो फिर बापिस गया और 2-3 साल तक कोई खवर नहीं मिली वो जमाना फेसबुक का नहीं था हमारे पास तो फोन भी नहीं था सो खवर मिलने का ऐसा कोई जरिया नहीं था |

एक दिन जब में बरेली से अपने घर आया तो खबर माँ ने बताया शाहनवाज आया था तेरा नंबर ले गया है (अब मेरे पास एक रिलायन्स का फोन आगया था) मुझे उस दिन बड़ी ख़ुशी हुई । यारी होती ही ऐसी है जिसमे दुरी बड़ी खलती है खेर अगले दिन वो आया । हम गले मिले हालचाल लिए और उसने अपनी जिंदगी की हालात वयां की । भाई की शादी हो चुकी थी और अपनी टेलरी की दुकान भी हो गई थी । और यहाँ हम अभी पढ़ ही रहे थे । मेने कहा यार बड़ी जल्दी ? वो मुस्कुरा के बोला क्या करू पढाई तो की नहीं । हालातों ने काम करना सीखा ही दिया , अब रिश्तेदारों ने जोर दिया तो ये भी कर ली 

हम खूब हँसे … हँसने से खलिश हल्की पड़ जाती है घंटों की ये मुलाकात बड़ी जल्दी बीत गई । वो चला गया और आज तक मुझे उसकी खबर नहीं है हालातों ने रिश्तों की डोर हलकी कर दी …
 उम्मीद है वो जहाँ है मजे से होगा । मुझे पता है इस तेज दुनिया में वो मुझे मिलेगा जरूर। अबके कुछ ऐसा करूँगा की इस डोर का एक धागा मेरे हाथ में रह जाये ताकि हर ईद को में उसे मुवारक कह सकूँ । मुझे बैसे तो उसकी याद नहीं आती लेकिन हर ईद को अनायास ही वो मुझे याद आजाता है बचपन में बने रिश्तों की छाप ऐसी ही होती है वो जब तब अपना रंग छोड़ ही देती है 
ईद की रात का आधा पहर बीत चूका है और मैं उन यादों को हमेशा के लिख के लिए रखने की कोशिश में लगा हूँ 
दोस्त तुम जहाँ भी हो तुम्हे ईद मुवारक !!


--- तुम्हारा नृपेंद्र 
( ये नाम दर्ज तीन तक रहा फिर दूसरे स्कूल में नाम निशान्त हुआ , लेकिन उसने मुझे हमेशा नृपेंद्र ही कहा )

Sunday, 26 June 2016

हर बार भुलाने की कोशिश में फिर याद तुम्हे कर लेता हूँ




हर बार भुलाने की कोशिश में फिर याद तुम्हे कर लेता हूँ
ये जख्म अभी भी गहरा है फिर बीते लम्हों को जी लेता हूँ

हर जाने वाले झोंके से फिर हाल वही कह देता हूँ
लहरों से छूटी मिटटी पर फिर नाम वही लिख देता हूँ

अब यार मेरे मुझको दीवाना पागल कहते हैं
मुँह पर उनके हँस देता हूँ मुड़कर थोड़ा रो लेता हूँ

हर भोर में आये सपने को सबसे यूँ कहता फिरता हूँ
सच हो जाये हर सपना बस इस गफलत जीता हूँ

जब बैचेनी बढ़ जाती है यूँ ही कुछ लिख लेता हूँ
शब्दों के इस संगम में थोड़ी ठंडक भर लेता हूँ



.....निशान्त

Tuesday, 21 June 2016

छोटा हूँ तो क्या हुआ, जैसे आँसू एक। /नरेश शांडिल्य

छोटा हूँ तो क्या हुआ, जैसे आँसू एक।
सागर जैसा स्वाद है, तू चखकर तो देख।।

देखा तेरे शहर को, भीड़ भीड़ ही भीड़।
तिनके ही तिनके मिले, मिला न कोई नीड़।।
मैंने देखा देश का, बड़ा सियासतदान।
न चेहरे पर आँख थी, न चेहरे पर कान।।
मैं खुश हूँ औज़ार बन, तू ही बन हथियार।
वक्त करेगा फ़ैसला, कोन हुआ बेकार।।
तू पत्थर की ऐंठ है, मैं पानी की लोच।
तेरी अपनी सोच है, मेरी अपनी सोच।।
लौ से लौ को जोड़कर, लौ को बना मशाल।
क्या होता है देख फिर, अंधियारों का हाल।।
----नरेश शांडिल्य

Thursday, 2 June 2016

एक अरसा गुजर गया तुमसे दूर हुए



एक अरसा गुजर गया तुमसे दूर हुए
तुम्हे न पाने की हताशा जब तब मुझे घेर लेती है
मन इस हताशा से दूर भागता हुआ
तुम्हारे साथ गुजारे लम्हों से मिलने पहुँच जाता है
और उंगलिया उन लम्हों को कागज पर लिखने लगती है
मुझे देखती तुम्हारी आँखों में मेरा चेहरा
प्रेम पत्रों में मुझे प्रिय का सम्बोधन
छुप-छुप कर मिलना
उन मुलाकातों में तुम्हारे दिए
वो कुछ दिन पुराने प्रेम पत्र
कहीं अँधेरे में एक दूसरे का हाथ पकड़ना
और फिर कस के लिपट जाना
ये सब लम्हे जस के तस है
मुझे पता है उन आँखों में अब मेरा चेहरा नहीं है
और शायद हो भी या फिर सिर्फ मेरा अक्स हो
बस हाल यही है
लिखते-लिखते हर शब्द अधूरा रह जाता है
मेरे प्रेम की तरह .....
-----निशान्त

Monday, 30 May 2016

तेज हवा का अंधड़ आया





तेज हवा का अंधड़ आया 
धूल का गुबार भी लाया 
साथ थोड़ी उलझन भी लाया
जो सड़कों पर थे भागे 
जो घरों में थे वो भी भागे 
सड़क वालो ने मुँह छुपाया
घर वालों ने बिजली वालों को गरियाया
खम्बे गिरे, झंफर टूटे 
दवे पांव बिजली भी भागी
झट से अँधेरा मैरे कमरे में घुस आया
एक बच्चा जोर से चिल्लाया मेह आया
ठंडी हवा के झोंके, बारिश की बूँदे
बिजली की कड़कड़ 
छत पे पड़ी टीन की धड़धड़
ये कुछ पल का मंजर 
बहुत सारी यादों को समेट लाया
बहुत दिनों से कुछ लिख नहीं पाया
बस ऐसे ही आँखों देखा हाल सुनाया

Monday, 23 May 2016

आदमी आदमी को क्या देगा / सुदर्शन फ़ाकिर




आदमी आदमी को क्या देगा
जो भी देगा वही ख़ुदा देगा

मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिब है
क्या मेरे हक़ में फ़ैसला देगा

ज़िन्दगी को क़रीब से देखो
इसका चेहरा तुम्हें रुला देगा

हमसे पूछो दोस्ती का सिला
दुश्मनों का भी दिल हिला देगा

इश्क़ का ज़हर पी लिया "फ़ाकिर"
अब मसीहा भी क्या दवा देगा

Saturday, 7 May 2016

चुपचाप उसको बैठ के देखूँ तमाम रात /बशीर बद्र (उजालों की परियाँ )




चुपचाप उसको बैठ के देखूँ तमाम रात 
जागा हुआ भी हो कोई सोया हुआ भी हो
उसके लिए तो मैंने यहाँ तक दुआएँ कीं 
मेरी तरह से कोई उसे चाहता भी हो
इतनी सियाह रात में किसको सदाएँ दूँ
ऐसा चिराग़ दे जो कभी बोलता भी हो

                                                                          ---- बशीर बद्र (उजालों की परियाँ )

Wednesday, 6 April 2016

आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है /सुदर्शन फ़ाकिर

आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है
ज़ख़्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यूँ है

जब हक़ीक़त है के हर ज़र्रे में तू रहता है
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है

अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी
अपनी नज़रों में हर इन्सान सिकंदर क्यूँ है

ज़िन्दगी जीने के क़ाबिल ही नहीं अब "फ़ाकिर"
वर्ना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है.

----सुदर्शन फ़ाकिर