Wednesday, 11 March 2015

जितना कम सामान रहेगा / गोपालदास "नीरज"

श्री गोपाल दास नीरज के संग्रह " बादलो से सलाम लेता हूँ " से 

जितना कम सामान रहेगा
उतना सफ़र आसान रहेगा

जितनी भारी गठरी होगी
उतना तू हैरान रहेगा

उससे मिलना नामुमक़िन है
जब तक ख़ुद का ध्यान रहेगा

हाथ मिलें और दिल न मिलें
ऐसे में नुक़सान रहेगा

जब तक मन्दिर और मस्जिद हैं
मुश्क़िल में इन्सान रहेगा

‘नीरज’ तो कल यहाँ न होगा
उसका गीत-विधान रहेगा


Tuesday, 10 March 2015

मैं होली के कुछ रंग छोड़ आया हूँ



मैं होली के कुछ रंग छोड़ आया हूँ !
कहीं ख़ुशी तो कहीं गम छोड़ आया हूँ !
कुछ चेहरे सुर्ख तो कुछ बेरंग छोड़ आया हूँ !
कहीं गलियां सुनी तो कहीं उनमे  टोली छोड़ आया हूँ !

                   जिन रास्तों को इंतजार रहता है  मेरा !
                   मैं उन्हें अब छोड़ आया हूँ !
                   लौट कर आऊंगा फिर से  कुछ नए रंग लेकर !
                   कुछ सुर्ख लाल तो कुछ गुलावी लेकर !
                   फिर से दौडूंगा उन गलिओं में रंग लेकर !
                   फिर से देखूंगा तुम्हे किसी की ओट लेकर !

                                     बेसब्री बेचैन हो उठती है !
                                     गुजरे वक्त के ख्वाव देख कर !
                                     माँ फिर से पुकारेगी गुझिया में प्यार भरके !
                                     माँ फिर से खड़ी होगी मेरी ढाल बनके !
                                    तेरी थपकी का एहसास अभी बाकी है !
                                    माँ अब मुझे तेरी याद बहुत आती है !



                                                                              .............निशान्त यादव








Friday, 6 March 2015

मेरा हर दिन होली रे ....


प्रेम रंग छूटे न छुटे ,
मेरा हर दिन होली रे ....

तुम  राधा , में श्याम रे
रंग हरा न डालो राधे
प्रेम का  रंग गुलावी रे

अबके बरस तुम दूर हो राधे
तुम बिन होली बिरहन लागे
रंग लगे मोहे बैरी से

करो तुम वादा अगले बरस का
राधे तुम बिन हर होली सुनी रे

प्रेम रंग छूटे न छुटे ,
मेरा हर दिन होली रे ....

Monday, 2 March 2015

अँधेरा छंट जायेगा

रुको !  डरते क्यों हूँ इस अँधेरे से
ये तो छंट  जायेगा
नयी सुबह का हिम्मत से इंतजार करो
अंतर्मन के अँधेरे से लड़ो
देखो हर तरफ उजाला है
रात का अँधेरा तो क्षणिक है
हर रात के बाद नयी सुबह जो है
चमकते जुगनुओं को देखो
दिन के उजाले को समेटकर
अँधेरे को आइना दिखाता है वो
अँधेरे और उजाले का सफर अनवरत है
उत्साह के बाद निराशा का होना सार्थक है
जैसे असफलता के बाद सफलता का होना
ये लड़ाई अनवरत है !
कृत्रिम और मन के अंधरे से !!!

-निशांत यादव

Monday, 23 February 2015

दोनों जहान तेरी मुहब्बत में हार के - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

दोनों जहान तेरी मोहब्बत मे हार के
वो जा रहा है कोई शबे-ग़म गुज़ार के 

वीराँ है मयकदः[1] ख़ुमो-सागर[2] उदास हैं
तुम क्या गये कि रूठ गए दिन बहार के 

इक फ़ुर्सते-गुनाह मिली, वो भी चार दिन
देखें हैं हमने हौसले परवरदिगार[3] के 

दुनिया ने तेरी याद से बेगानः कर दिया
तुम से भी दिलफ़रेब[4] हैं ग़म रोज़गार के 

भूले से मुस्कुरा तो दिये थे वो आज ’फ़ैज़’
मत पूछ वलवले दिले-नाकर्दःकार[5] के

शब्दार्थ:
1 शराबघर
2 सुराही और जाम
3 ईश्वर, ख़ुदा
4 दिल को धोखा देने वाले
5 अनुभवहीन हृदय

Friday, 20 February 2015

मझधार क्या है

संघर्ष पथ पर चल दिया
फिर सोच और विचार क्या
जो भी मिले स्वीकार है
यह जीत क्या वह हार क्या
संसार है सागर अगर 
इस पार क्या उस पार क्या
पानी जहाँ गहरा वहीँ
गोता लगाना है मुझे
तुम तीर को तरसा करो
मेरे लिए मझधार क्या
आदरणीय Ashok Chakradhar की वाल से उनके पिता की ये कविता

Wednesday, 18 February 2015

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है,
मन का विश्वास रगों मैं साहस भरता है,
चढ़कर गिरना गिरकर चढ़ना न अखरता है,
मेहनत उसकी बेकार हर बार नहीं होती,
कोशिश करनेवालों की कभी हर नहीं होती।
डुबकियां सिन्धुमें गोताखोर लगता है,
जा जा कर खालीहाथ लौटकर आता है,
मिलते न सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दूना विश्वास इसी हैरानी में,
मुट्ठी उसकी खाली हरबार नहीं होती,
कोशिश करनें वालों की कभी हार नही होती।
असफलता एक चुनौती है स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई देखो और सुधार करो,
जब तक न सफल हो नींद चैन की त्यागो तुम,
संघर्षोंका मैदान छोड़ मत भागो तुम,
कुछ किए बिना ही जयजयकार नही होती,
कोशिश करनें वालों की कभी हार नही होती।

Saturday, 14 February 2015

नयी सरकार नयी उम्मीदें - Congratulation Arvind kejriwal


दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने केलिए  अरविन्द केजरीवाल को बधाई | आज उन्होंने औपचारिक शपथ लेकर इसे पूर्ण किया , रामलीला मैदान तमाम ऐतिहासिक घटनाओ का गवाह रहा है और आज फिर से  इतिहास को इसी मैदान में दोहराया , आज अरविन्द केजरीवाल ने  जिस सकारात्मक राजनीती की झलक दिखाई उस से उम्मीदें जगी है उन्होंने सबसे पहले सत्ता के अहंकार से चेताया क्योकि सत्ता या किसी पद के मिल जाने पर अपने आप को  बनायें रखना कठिन होता है |  खेर इसका फैसला भी बक्त करेगा , आज उन्होंने जो सबसे मुख्य  बात कही जो बाकई सकारात्मक राजनीती का पहला कदम है  सबको साथ लेकर चलने की बात | आज उन्होंने अपने साथ बीजेपी के तीन बिधायको को भी अपना ही बताया , उन्होंने अपने बिपक्षी , किरण वेदी , अजय माकन के अनुभवों की  सेवा लेने की बात भी कही और ये बड़ी सकारात्मक  पहल है कोई व्यक्ति देश के किसी संबैधानिक पद पर बैठने के बाद पूरे देश का या प्रदेश का होता है और यह बात अन्य पार्टी और नेताओं को अरविन्द केजरीवाल  से सीखनी चाहिए , अरविन्द केजरीवाल ने जो भाषण आज दिया उसका निचोड़ यही रहा  की वो दिल्ली को बदल देना चाहते और वो भी सबको  साथ लेकर ,सबके अनुभवों को साथ लेकर | उनके अंदर आज मुझे एक ऐसा व्यक्ति नजर आया जो सबकुछ ठीक कर देना चाहता है  मुझे उम्मीद है ये सकारात्मकता आम आदमी पार्टी के प्रसार को और बढ़ाएगी  अंततः आज का दिन ऐतिहासिक और आशाओ भरा रहा , में अरविन्द केजरीवाल , उनके मंत्रिओं , विधायको , दिल्ली की महान जनता को बधाई देता हूँ और उम्मीद करता हूँ नयी सरकार अच्छा काम करेगी , अन्यथा हम तो जनता है "गड़बड़ हुई तो फिर से कोई और सरकार"

निशांत यादव 

Friday, 13 February 2015

Love in Inbox – #इनबॉक्स_लव – 5


कितने बेदर्द हो गए हैं तुम्हारी यादों के फ़ूल ,ये काँटों से मेरा रास्ता रोकते हैं 
अपने हाथ में तुम्हारे हाथ के होने एहसास आया ही था कि एक कांटा मेरी कल्पनाओ को चीरता हुआ निकल गया 
शायद तुमने यादों पे काँटों का पहरा दे रखा है 
लेकिन सुनो तुमने जो फूल मुझे दिया था मेने उसकी मुरझाती पत्तियों को डायरी के पन्नों में अब भी जिन्दा रखा है बिल्कुल तुम्हारी यादों की तरह और पता है तुम्हे ,
मेने उस पन्ने को नाम दिया है मेरे एहसासों का पन्ना
कभी इन पन्नों जो पढ़ना चाहो तो अपने इनबॉक्स में जरूर देखना मेने इस पन्ने का पता भेजा हैं
# लव इन इनबॉक्स


Thursday, 12 February 2015

Love in Inbox – #इनबॉक्स_लव – 4


# लव इन इनबॉक्स (एक छोटा सा  प्रयास लप्रेक - फ़ेसबुक फ़िक्शन श्रृंखला​ और Sujit Kumar​ से प्रेरित होकर ये इस श्रंखला की चौथी और मेरी पहली रचना )
अन्य रचनाएँ आप यहाँ पढ़ सकते हैं http://www.sujitkumar.in/love-in-inbox-3/

सुनो इधर आओ ,
हाँ  कहो ,
अरे इधर तो आओ हाँ बताओ न ,
देखो इनबॉक्स में एक मेसेज अन रीड है
क्यों रीड क्यों नहीं किया ?
कब का है ?
जब हम पहली बार मिले थे मैं ऑफिस  में था और तुमने मेल किया था , अभी के अभी मिलो | तब अभी तरह वाट्स एप्प कहा था और तुम्हारे मेसेज के ३ घंटे बाद पंहुचा था मैं
तो  तुम तो आज भी बैसे ही हो ,फेसबुक चैट ऑफ करके रखते हो और वाट्स एप्प पे लिखा  है नो डिस्टर्ब प्लीज ,
हाँ पर ये तुम्हारे लिए तो है
मतलब ?
मतबल ये की सिर्फ तुमसे बात ,
झूठे !
अच्छा ये बताओ जब ये सालो पुराना मेल अब तक  अन रीड है तो फिर तुमने मेरे बुलाने की खवर को जाना कैसे ?
देखो तुम्हे पकड़ लिया झूठे !

Thursday, 5 February 2015

प्रेम समर है कठिन रे साथी

प्रियतम प्रेम राग न छेड़ो
मैं  विरह से भरा हुआ हूँ
वादो के  इस भंबरजाल में
नाउम्मीदी से घिरा  हुआ हूँ
प्रेम तत्व है जोड़ने वाला
मैं  इससे अब टूट चुका हूँ
बेमानी है कस्मे वादे
मैं  इनसे ही लुटा हुआ हूँ
में हूँ प्रेम का ऐसा पंछी
जिसकी रही उड़ान अधूरी
मेरे पंख थके समर में
नव पल्लव कहा से लाऊँ
प्रेम समर है कठिन रे साथी
मैं  हारा हूँ इसी समर में ....


निशांत यादव 

Saturday, 17 January 2015

जन आंदोलनों का राजनैतिक अंत -Movement Dead on Politics


वो दिन मेरे जेहन में आज भी जिन्दा है जब रामलीला मैदान में अन्ना हजारे अपने बजीरो के साथ देश की तत्कालीन सरकार के खिलाफ हुंकार भर रहे है थे उस समय तमाम राजनैतिक विपक्षी अन्ना के समर्थन में आ खड़े हुए और उस समय अन्ना जी का साफ आदेश था , कोई राजनैतिक आदमी मंच पर नहीं चढ़ने पाये | उनके इस आदेश की तामील करने वाली किरण वेदी जी थी , उन्होंने उस समय के तमाम राजनैतिक लोगो से कठिन सवाल पूछे और उन पर तेज हमले भी किये उन्होंने उन्ही मोदी से दंगे का कभी न माफ़ करने वाला सवाल पुछा तो जिन अरुण जेटली जी के उपस्थिति बीजेपी की सदस्य्ता ली , उन पर भी आरोप लगाये , अन्ना आंदोलन के दो धुरी थे किरण वेदी और अरविन्द केजरीवाल , केजरीवाल तो पहले ही राजनीती में आ चुके है और कहीं न कहीं उन्होंने इस देश में एक नयी राजनीती की सोच को जीवित किया है और उसका असर ही एक आज बीजेपी को नरेंद्र मोदी की अच्छी छवि के बाबजूद किरण वेदी को लाना पड़ा . वार्ना किरण वेदी जैसी  कड़क महिला को बीजेपी क्या कोई भी राजनैतिक पार्टी शामिल करना नहीं चाहेगी , किरण वेदी की अपनी एक शैली है और मुझे उम्मीद है बो अब भी उस शैली पर  कायम रहेगी | भारत में जो भी बड़े जन आंदोलन हुए है जो सरकारों की निरंकुशता के खिलाफ खड़े हुए उनका अंत राजनैतिक ही हुआ , वे जिस गन्दी राजनीती के खिलाफ खड़े हुए , अंत में उस आंदोलन  सेनापति को दरनिकार करते हुए उसके सिपाही भी उसी गन्दी राजनीती में जा मिले जिसको उन्होंने कथित रूप से गन्दा वताया ,  इतिहास गवाह है जेपी आंदोलन से निकले बिहार के नेता हो या उत्तर प्रदेश के नेता सभी जातिवाद , सम्प्रदायवाद , भ्रष्टाचार के  गलियारों से होते सत्तासीन हुए , हमने तब भी एक अच्छी राजनीती की शुरुआत की उम्मीद की थी  , लेकिन समय साथ हमारी उम्मीदें टूटती गयीं और फिर उसी आंदोलन के क्रांतिकारिओं से त्रस्त होकर फिर एक नयी आशा के रूप अन्ना आंदोलन का साथ दिया , और एक जनलोकपाल की मांग की , हालांकि  हम में से तमाम आशावादीलोगो को   जनलोकपाल के बारीक़ फायदे के वारे में नहीं पता था , बस इतना था ये शब्द हमें कुछ राहत देगा , लेकिन अंतता इस आशा का राजनैतिक अंत  ही हुआ , एक सुखद ये रहा इस आंदोलन के सिपाही ने एक नयी तरह की राजनीती की शुरुआत  की , और उसी कड़ी का एक हिस्सा है किरण वेदी का बीजेपी में शामिल होना , ये बड़ी सही शुरुआत  है किरण वेदी यदि बीजेपी की मुख्यमंत्री बनती है और उनकी शैली भी बही १९८४ हो या इंद्रा गांधी की कार पार्किंग का मामला हो , तो फिर जरूर कुछ सही हो जायेगा , लेकिन मुझे इसकी उम्मीद बड़ी क्षीण लगती है क्यों की किरण वेदी चर्चित जरूर है लेकिन उनके पास जनाधार नहीं , और जिन नेताओं के पास जनाधार है बो किरण वेदी के आने से बैकफुट में आगये है हालाकिं अभी वे भले ही ही ही करते हो लेकिन कहीं न कहीं ये चुभन उनके ह्रदय में रहेगी , और मुझे ऐसा शक है किरण वेदी इसी गुटबाजी का शिकार हो जायेगीं , किरण अमित शाह और बीजेपी के पाश में फंस गयीं , बीजेपी ने धीरे इस लड़ाई को मोदी वनाम केजरीवाल से , वेदी वनाम केजरीवाल कर दिया है , वेदी जीती तो बीजेपी और मोदी  की जय  , यदि वो हारी तो फिर वेदी की हार ,और यदि वे कथित राजनीति से समझोता क़र  लेती है तब फिर इस देश में लोगो आंदोलनों के विश्वास उठ जायेगा , शायद फिर कोई जेपी , अन्ना , किरण , या केजरीवाल नहीं होंगे , ..........

Thursday, 1 January 2015

अलविदा 2014 - स्वागत नए वर्ष का (Happy New Year 2015)




जो वर्ष बीत गया उस वर्ष में हम सब ने बहुत कुछ खोया और बहुत कुछ पाया और खोना पाना जीवन की नियति है और सच में देखे तो सिर्फ तारीख बदलती है और कुछ नहीं , हाँ  लेकिन हम सब मिल कर  नए साल के बहाने जश्न मानते है गिले शिकवे भुलाते हैं दुःख को ख़ुशी और जश्न की शाम से काटने की कोशिश करते है और शायद हर त्यौहार का मूल ही यही है , हमने बीते साल में चंद्रयान जैसी सफलता भी देखी तो कश्मीर में बाढ़ से त्रस्त जनजीवन भी देखा , हमने जाते जाते इस साल में मानबता को हिला देने वाला पेशावर हमला और एयर एशिया का विमान हादसा भी देखा , इन सब के अलावा तमाम उपलब्धियां और विभीषिकाएँ देखी,  जिन्होंने हमें ऊँचे आसमान तक पहुचाया और जमीं पर लाकर भी पटक दिया , लेकिन आइये हम सब इन सफलताओं से प्रेरित होकर और विभिषकाओं से सवक लेते हुए , नए साल का स्वागत बाहें फैला कर करें और उम्मीद करें आने वाले साल में दुःख काम हो और ख़ुशी जायदा ,

अंत में सभी आदरणीयं , मित्रो को नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें

                                                                           निशांत यादव