Friday, 13 February 2015

Love in Inbox – #इनबॉक्स_लव – 5


कितने बेदर्द हो गए हैं तुम्हारी यादों के फ़ूल ,ये काँटों से मेरा रास्ता रोकते हैं 
अपने हाथ में तुम्हारे हाथ के होने एहसास आया ही था कि एक कांटा मेरी कल्पनाओ को चीरता हुआ निकल गया 
शायद तुमने यादों पे काँटों का पहरा दे रखा है 
लेकिन सुनो तुमने जो फूल मुझे दिया था मेने उसकी मुरझाती पत्तियों को डायरी के पन्नों में अब भी जिन्दा रखा है बिल्कुल तुम्हारी यादों की तरह और पता है तुम्हे ,
मेने उस पन्ने को नाम दिया है मेरे एहसासों का पन्ना
कभी इन पन्नों जो पढ़ना चाहो तो अपने इनबॉक्स में जरूर देखना मेने इस पन्ने का पता भेजा हैं
# लव इन इनबॉक्स


Thursday, 12 February 2015

Love in Inbox – #इनबॉक्स_लव – 4


# लव इन इनबॉक्स (एक छोटा सा  प्रयास लप्रेक - फ़ेसबुक फ़िक्शन श्रृंखला​ और Sujit Kumar​ से प्रेरित होकर ये इस श्रंखला की चौथी और मेरी पहली रचना )
अन्य रचनाएँ आप यहाँ पढ़ सकते हैं http://www.sujitkumar.in/love-in-inbox-3/

सुनो इधर आओ ,
हाँ  कहो ,
अरे इधर तो आओ हाँ बताओ न ,
देखो इनबॉक्स में एक मेसेज अन रीड है
क्यों रीड क्यों नहीं किया ?
कब का है ?
जब हम पहली बार मिले थे मैं ऑफिस  में था और तुमने मेल किया था , अभी के अभी मिलो | तब अभी तरह वाट्स एप्प कहा था और तुम्हारे मेसेज के ३ घंटे बाद पंहुचा था मैं
तो  तुम तो आज भी बैसे ही हो ,फेसबुक चैट ऑफ करके रखते हो और वाट्स एप्प पे लिखा  है नो डिस्टर्ब प्लीज ,
हाँ पर ये तुम्हारे लिए तो है
मतलब ?
मतबल ये की सिर्फ तुमसे बात ,
झूठे !
अच्छा ये बताओ जब ये सालो पुराना मेल अब तक  अन रीड है तो फिर तुमने मेरे बुलाने की खवर को जाना कैसे ?
देखो तुम्हे पकड़ लिया झूठे !

Thursday, 5 February 2015

प्रेम समर है कठिन रे साथी

प्रियतम प्रेम राग न छेड़ो
मैं  विरह से भरा हुआ हूँ
वादो के  इस भंबरजाल में
नाउम्मीदी से घिरा  हुआ हूँ
प्रेम तत्व है जोड़ने वाला
मैं  इससे अब टूट चुका हूँ
बेमानी है कस्मे वादे
मैं  इनसे ही लुटा हुआ हूँ
में हूँ प्रेम का ऐसा पंछी
जिसकी रही उड़ान अधूरी
मेरे पंख थके समर में
नव पल्लव कहा से लाऊँ
प्रेम समर है कठिन रे साथी
मैं  हारा हूँ इसी समर में ....


निशांत यादव 

Saturday, 17 January 2015

जन आंदोलनों का राजनैतिक अंत -Movement Dead on Politics


वो दिन मेरे जेहन में आज भी जिन्दा है जब रामलीला मैदान में अन्ना हजारे अपने बजीरो के साथ देश की तत्कालीन सरकार के खिलाफ हुंकार भर रहे है थे उस समय तमाम राजनैतिक विपक्षी अन्ना के समर्थन में आ खड़े हुए और उस समय अन्ना जी का साफ आदेश था , कोई राजनैतिक आदमी मंच पर नहीं चढ़ने पाये | उनके इस आदेश की तामील करने वाली किरण वेदी जी थी , उन्होंने उस समय के तमाम राजनैतिक लोगो से कठिन सवाल पूछे और उन पर तेज हमले भी किये उन्होंने उन्ही मोदी से दंगे का कभी न माफ़ करने वाला सवाल पुछा तो जिन अरुण जेटली जी के उपस्थिति बीजेपी की सदस्य्ता ली , उन पर भी आरोप लगाये , अन्ना आंदोलन के दो धुरी थे किरण वेदी और अरविन्द केजरीवाल , केजरीवाल तो पहले ही राजनीती में आ चुके है और कहीं न कहीं उन्होंने इस देश में एक नयी राजनीती की सोच को जीवित किया है और उसका असर ही एक आज बीजेपी को नरेंद्र मोदी की अच्छी छवि के बाबजूद किरण वेदी को लाना पड़ा . वार्ना किरण वेदी जैसी  कड़क महिला को बीजेपी क्या कोई भी राजनैतिक पार्टी शामिल करना नहीं चाहेगी , किरण वेदी की अपनी एक शैली है और मुझे उम्मीद है बो अब भी उस शैली पर  कायम रहेगी | भारत में जो भी बड़े जन आंदोलन हुए है जो सरकारों की निरंकुशता के खिलाफ खड़े हुए उनका अंत राजनैतिक ही हुआ , वे जिस गन्दी राजनीती के खिलाफ खड़े हुए , अंत में उस आंदोलन  सेनापति को दरनिकार करते हुए उसके सिपाही भी उसी गन्दी राजनीती में जा मिले जिसको उन्होंने कथित रूप से गन्दा वताया ,  इतिहास गवाह है जेपी आंदोलन से निकले बिहार के नेता हो या उत्तर प्रदेश के नेता सभी जातिवाद , सम्प्रदायवाद , भ्रष्टाचार के  गलियारों से होते सत्तासीन हुए , हमने तब भी एक अच्छी राजनीती की शुरुआत की उम्मीद की थी  , लेकिन समय साथ हमारी उम्मीदें टूटती गयीं और फिर उसी आंदोलन के क्रांतिकारिओं से त्रस्त होकर फिर एक नयी आशा के रूप अन्ना आंदोलन का साथ दिया , और एक जनलोकपाल की मांग की , हालांकि  हम में से तमाम आशावादीलोगो को   जनलोकपाल के बारीक़ फायदे के वारे में नहीं पता था , बस इतना था ये शब्द हमें कुछ राहत देगा , लेकिन अंतता इस आशा का राजनैतिक अंत  ही हुआ , एक सुखद ये रहा इस आंदोलन के सिपाही ने एक नयी तरह की राजनीती की शुरुआत  की , और उसी कड़ी का एक हिस्सा है किरण वेदी का बीजेपी में शामिल होना , ये बड़ी सही शुरुआत  है किरण वेदी यदि बीजेपी की मुख्यमंत्री बनती है और उनकी शैली भी बही १९८४ हो या इंद्रा गांधी की कार पार्किंग का मामला हो , तो फिर जरूर कुछ सही हो जायेगा , लेकिन मुझे इसकी उम्मीद बड़ी क्षीण लगती है क्यों की किरण वेदी चर्चित जरूर है लेकिन उनके पास जनाधार नहीं , और जिन नेताओं के पास जनाधार है बो किरण वेदी के आने से बैकफुट में आगये है हालाकिं अभी वे भले ही ही ही करते हो लेकिन कहीं न कहीं ये चुभन उनके ह्रदय में रहेगी , और मुझे ऐसा शक है किरण वेदी इसी गुटबाजी का शिकार हो जायेगीं , किरण अमित शाह और बीजेपी के पाश में फंस गयीं , बीजेपी ने धीरे इस लड़ाई को मोदी वनाम केजरीवाल से , वेदी वनाम केजरीवाल कर दिया है , वेदी जीती तो बीजेपी और मोदी  की जय  , यदि वो हारी तो फिर वेदी की हार ,और यदि वे कथित राजनीति से समझोता क़र  लेती है तब फिर इस देश में लोगो आंदोलनों के विश्वास उठ जायेगा , शायद फिर कोई जेपी , अन्ना , किरण , या केजरीवाल नहीं होंगे , ..........

Thursday, 1 January 2015

अलविदा 2014 - स्वागत नए वर्ष का (Happy New Year 2015)




जो वर्ष बीत गया उस वर्ष में हम सब ने बहुत कुछ खोया और बहुत कुछ पाया और खोना पाना जीवन की नियति है और सच में देखे तो सिर्फ तारीख बदलती है और कुछ नहीं , हाँ  लेकिन हम सब मिल कर  नए साल के बहाने जश्न मानते है गिले शिकवे भुलाते हैं दुःख को ख़ुशी और जश्न की शाम से काटने की कोशिश करते है और शायद हर त्यौहार का मूल ही यही है , हमने बीते साल में चंद्रयान जैसी सफलता भी देखी तो कश्मीर में बाढ़ से त्रस्त जनजीवन भी देखा , हमने जाते जाते इस साल में मानबता को हिला देने वाला पेशावर हमला और एयर एशिया का विमान हादसा भी देखा , इन सब के अलावा तमाम उपलब्धियां और विभीषिकाएँ देखी,  जिन्होंने हमें ऊँचे आसमान तक पहुचाया और जमीं पर लाकर भी पटक दिया , लेकिन आइये हम सब इन सफलताओं से प्रेरित होकर और विभिषकाओं से सवक लेते हुए , नए साल का स्वागत बाहें फैला कर करें और उम्मीद करें आने वाले साल में दुःख काम हो और ख़ुशी जायदा ,

अंत में सभी आदरणीयं , मित्रो को नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें

                                                                           निशांत यादव

Wednesday, 24 December 2014

मनाली मत जइयो - अटल बिहारी वाजपेयी


यूँ ही पढ़ते पढ़ते अटल जी एक रुमानियत भरी कविता पढ़ने को मिली , अटल जी अच्छे वक्ता तो है साथ साथ एक अच्छे रुमानियत भरे कवि भी हैं आप भी आनंद लीजिये  इस मनोहारी कविता का ..

मनाली मत जइयो, गोरी 
राजा के राज में।                                                   
                      

जइयो तो जइयो, 
उड़िके मत जइयो, 
अधर में लटकी हौ, 
वायुदूत के जहाज़ में। 

जइयो तो जइयो, 
सन्देसा न पइयो, 
टेलिफोन बिगड़े हैं, 
मिर्धा महाराज में। 

जइयो तो जइयो, 
मशाल ले के जइयो, 
बिजुरी भइ बैरिन 
अंधेरिया रात में। 

जइयो तो जइयो, 
त्रिशूल बांध जइयो, 
मिलेंगे ख़ालिस्तानी, 
राजीव के राज में। 

मनाली तो जइहो। 
सुरग सुख पइहों। 
दुख नीको लागे, मोहे 
राजा के राज में।

Tuesday, 23 December 2014

धर्म का मर्म ( Religion for Live, not For Show off)




एक बार ऋषि वाल्मीकि के पास कुछ लोग आये और बोले ऋषिवर हमने हर देवता की मूर्ति बना ली है लेकिन धर्म  की मूर्ति कैसे बनायें ! कुछ सूझता ही नहीं की उसकी नासिका (नाक ) , हनु (ठोड़ी) , ललाट ( माथा ) , इत्यादि कैसे है ! कृपया मार्ग दर्शन करें हमें धर्म की पूजा करनी हैं ! ऋषि वाल्मीकि हँसे और वोले धर्म का कोई आकर नहीं है ये तो चैतन्य हैं जीवन को जीने का माध्यम मात्र है , धर्म को जी सकते है और उसकी पूजा उसे जी कर ही हो सकती है धर्म कोई किताव या मूर्ति में नहीं होता 

ये आपके स्वभाव में होता है वे सभी लोग खुश होकर बापिस लौटे  गए और जिनकी मूर्ति उन्होंने बनायीं थी उन देवताओं के आदर्शो को उन्होंने जिया ना कि सिर्फ आडंबर ( दिखावा ) किया और इसी प्रकार एक बार कौरवों और पांडवों के गुरु ने उन्हें दो पक्ति याद करने को दी , की "सत्य ही जीवन है " और “धर्म का पालन ही सत्य है " ये दोनों वाक्य सब भाईओं को याद हो गए लेकिन युधिष्ठिर को याद नहीं हुए ! उनके गुरु ने पुछा युधिष्ठिर तुम सब से बुद्दिमान हो,किन्तु तुम्हे ये दो वाक्य कैसे याद नहीं हुए? युधिष्ठिर वोले गुरुदेव ये दोनों वाक्य भला इतनी शीघ्र कैसे याद हो सकते हैं ये वाक्य तो जीवन को जीने से और इनका पालन करने से ही याद होंगे और गुरु देव ने उन्हें गले लगा लिया और वो धर्मराज हुए !अत धर्म और धर्मांतरण के नाम लड़ना किसी धर्म का पालन नहीं और दरअसल धर्म का कोई नामकरण ही नहीं हैं ये तो चैतन्य हैमित्रो धर्म के मर्म को समझो और धर्मांतरण या धर्म के पालन और उसके तत्व के ज्ञान में विभेद करना सीखो , ध्यान रखो सत्य और धर्म चैतन्य है ,स्वभाव है, जीने का नाम है , कोई दिखावा नहीं ........

...निशांत यादव
                                                                                      


                                                                                          



Wednesday, 3 December 2014

आत्मा है खाली हाथ (A Soul with Empty Hand ) .....



 परमार्थ का स्वार्थ से मेल क्या है !

सत्य का असत्य से भला नाता कैसा !


इन सब तुलनाओं के बीच !


एक सत्य है जीवन और मृत्यु का होना !

जीवन का मृत्यु से और मृत्यु का जीवन से राग अलग है !


क्रोध , द्वेष , हिंसा और मोह माया !


प्रेम , त्याग बैराग्य और तपस्या !


यही इस जीवन का सच है !


मृत्यु क्या है ?


सिर्फ निस्वार्थ चले जाने खाली हाथ ?


हा यही है सच है मृत्यु बाद !


आत्मा है खाली हाथ .............

           

                                                                                            
                                                                                   निशान्त यादव