Wednesday, 3 December 2014

आत्मा है खाली हाथ (A Soul with Empty Hand ) .....



 परमार्थ का स्वार्थ से मेल क्या है !

सत्य का असत्य से भला नाता कैसा !


इन सब तुलनाओं के बीच !


एक सत्य है जीवन और मृत्यु का होना !

जीवन का मृत्यु से और मृत्यु का जीवन से राग अलग है !


क्रोध , द्वेष , हिंसा और मोह माया !


प्रेम , त्याग बैराग्य और तपस्या !


यही इस जीवन का सच है !


मृत्यु क्या है ?


सिर्फ निस्वार्थ चले जाने खाली हाथ ?


हा यही है सच है मृत्यु बाद !


आत्मा है खाली हाथ .............

           

                                                                                            
                                                                                   निशान्त यादव

Friday, 28 November 2014

कुछ नए अंदाज

कुछ नए अंदाज लिखे है उम्मीद है पसंद आएंगे

1:
तुम जो इतने सादा दिखते हो
हो भी हो
या
यूँ ही दिखते हो

2:
ये जितने भी पेच मुझमें दिखाई देते हैं
वो सादगी से उलझने का बयां करते हैं 

3:-
में तो बदनाम हूँ सिर्फ तुम्हारी नजरो में
बाकि सारा जमाना मेरा आशिक है

4:-
पाले बेठा था जो भरम बरसो से
बिखर सा  गया है आज
रंज सिर्फ इतना है
ये कुछ दिन और रहता

5:-
कुछ सवाल अब भी बाकि है जेहन में 
कभी आओ तो ये बोझ उतरे

Sunday, 9 November 2014

कहीं खो गयी है माँ ... (A lost Mother )



जब हम अपने शहर या गांव  को छोड़ कर किसी दूसरे शहर में जाते है चाहे वह  रोजगार की तलाश हो या फिर एक अच्छे भविष्य की , तब हम धीरे -धीरे उस शहर के रंग में रंगने लगते है और जिस शहर या गांव  को छोड़ कर आये होते हैं वहां की सोच और संस्कार को धकियाते हुए इस शहर की दौड़ती भीड़ में शामिल हो जिंदगी को दौड़ाना चाहते है


लेकिन तभी भागते हुए हमारा पैर भावनाओं के स्पीड ब्रेकर से टकराता है कुछ लोग उसे पीछे की सोच मान कर अपनी जिंदगी की गाड़ी कुदा देते है चाहे ये गाड़ी टूटे या बचे इसकी परवाह भला किसको रहती है |


लेकिन कुछ लोग उस स्पीड ब्रेकर को देखकर रुक जाते हैं और अपने आप से पूछते हैं

क्या तुझमे है.. हिम्मत जो इस स्पीड ब्रेकर से जिंदगी की गाड़ी को कुदा सके ,

मै भी उनमे से एक हूँ भागती-दौड़ती जिंदगी के सफर में यूँ ही अचानक भावनाओं के स्पीड ब्रेकर पर रुका खुद से सवाल पूछ रहा हूँ |



इन्ही सवालो और जवावो से  जूझते हुए  सच्ची घटना पर आधारित ये कहानी लिखी है

यदि मेरे लिखे ये शब्द आपको भी दौड़ते हुए उस स्पीड ब्रेकर की तरह रोके और खुद के अंदर झाकने पर मजवूर करें तो समझ लीजिये आप इस शहर के नहीं हुए है

*****************************************************************************


शाहिद .. शाहिद….


मेट्रो ट्रैन में दूर से आती.. ये एक औरत की आवाज मेरे और करीव आती जा रही थी |

रोज मर्रा की तरह हर कोई अपने आप को किसी माध्यम में उलझाये हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहा था | इस दूर से आती आवाज ने लोगो की तन्द्रा को थोड़ा विचलित सा तो किया लेकिन लोग फिर अपने आप में या अपने साथ वाले अपने हमसफ़र में खो गए | मैं  भी मेट्रो के दरबाजे की तरफ मुंह किये कही खोया हुआ था मगर ये आवाज मेरे और करीव आती जा रही थी | ये आवाज मुझे और मेट्रो के डिब्बे में सवार लोगो को ज्यादा विचलित कर रही थी | आठ डिब्बे की ट्रैन में जैसे -जैसे वो औरत एक-एक डिब्बे को पार करती आ रही थी | इस आवाज की तीब्रता और अधिक बढ़ती जा रही थी मेने और यात्रिओं की तरह डिब्बे की गैलेरी में झांक कर देखा तो सिर्फ आवाज ही सुनाई दे रही वो औरत नहीं |


मेरे मन में तमाम सवाल कौंधे ???

आखिर ये औरत कौन है ?, इसकी उम्र क्या है  ?

ये इतनी बेचैनी से इस नाम की आवाज क्यों लगा रही है ?


अब तक ये सवाल मेरे मन में ही थे कि मुझे लोगो से इनके जवाव मिलने लगे , कोई वोला लगता है पागल है| मेट्रो में चिल्ला रही है | कोई वोला लगता है इसका कोई खो गया है तो किसी ने सिर्फ अपने चेहरे के भावो से ही अपने  जवाव दर्ज कर दिए , मेरा मन इन जवावो की तरफ गया लेकिन मेने खुद को रोक  उसके आने का इंतजार किया | मेने अचानक देखा कि  वो सत्तर साल की औरत भीड़ को चीरती हुई मेरे सामने आ गई, और दूसरी तरफ  डिब्बे में सन्नाटा छा गया | लोग निशब्द हो कर खड़े थे और सिर्फ एक ही आवाज मेरे कानो में जोर-जोर  से टकरा रही थी


शाहिद .. शाहिद.. , कहाँ  चलो गयो रे…


उस बक्त मुझे इस सन्नाटे ने अपनी तरफ खींच लिया , मैं भी उस भीड़ की तरह निशब्द खड़ा रहा जो अभी अभी मेरे मन में कौंधे सवालो का जवाव खुद ही दे रही थी वो बूढ़ी औरत इस आवाज के साथ मेरे करीव से गुजरती जा रही थी और मैं स्वार्थी सा भीड़ में शामिल हो चुपचाप खड़ा था , लोग शायद इस इंतजार में खड़े थे की ये हमसे पूछे , लेकिन वो सिर्फ एक ही  नाम पुकार रही थी और आगे बढ़ती जा रही थी


शायद वो इस सवाल का जवाव सिर्फ ये चाहती थी , हाँ माँ मैं ये रहा .. तू क्यों चिल्ला रही है मत चिल्ला ये मेट्रो है , लोग यहां सिर्फ गानो का शोर पसंद करते है बो भी सिर्फ सीधे उनके कानो में , लेकिन उस बेसुध और बदहवास सी माँ को ये जवाव कहीं  से नहीं मिला वो  लगातार सिर्फ शाहिद .. शाहिद.. चिल्लाती रही और भीड़ को चीरती डिब्बे को पार करती आगे बढ़ती जा रही थी | तभी एक स्टेशन आ गया और अपने कानो में संगीत का शोर सुनने वाले लोग उतरने लगे , वो बूढी माँ एक उतरते नौजवान लड़के के बीच में आ गई और वो जवान लड़का जोर से चिल्लाया..


कहाँ,कहाँ आ जाते हैं लोग ठीक से उतरने भी नहीं देते , वो दुत्तकारता हुआ उतर गया, शायद वो किसी माँ का शाहिद नहीं था या फिर उसकी माँ इस माँ की तरह नहीं थी, उस बूढी माँ की आवाज अब भी मेरे कानो में सुनाई पड़ रही थी ,मगर इसकी तीब्रता उतनी नहीं नहीं थी |

शायद उसे उसका शाहिद अभी मिला नहीं था , उतरने वाले उतर रहे थे और चढ़ने वाले चढ़ रहे थे


और मैं अब भी निशब्द सा ...

अपने अंदर उठते सवालो की तीब्रता से जूझ रहा था ,मैं खुद से सवाल पूछ रहा था | 


तू चुप क्यों रहा ? 

तूने उस बूढ़ी माँ  से  पूछा क्यों नहीं की तुम किसे ढूंढ रही हो ? 

ये शाहिद कौन है ? 

क्या तुम्हारा बेटा है ,

क्या वो खो गया है या फिर तुम खो गई हो ?

या फिर..

उस उतरते नौजवान लड़के की तरह तुम्हारा शाहिद भी तुम्हे धकियाता हुआ,

हमेशा के लिए छोड़ कर चला गया है

क्या में इस पत्थर के शहर की तरह पत्थर  का हो गया हूँ ?


या फिर कोई इंसानी रोबोट जो सिर्फ सुबह उठता  है , धक्के खाता हुआ मेट्रो से नौकरी पर जाता है वापिस अपने घर की तरफ भागता है और हर रोज यही रोजमर्रा की जिंदगी दोहराता है


क्या अगर तू गांव  की बस में होता ?

और तब ये माँ ऐसे चिल्लाती तू तब भी इस बेजार निशब्द भीड़ में शामिल हो चुप चाप खड़ा रहता ?


क्या ये पढ़े लिखे लोगो की  संवेदनहीन भीड़ यूँ ही चुपचाप एक दूसरे का मुँह ताकती खड़ी रहती



क्या तू नहीं पूछता माँ क्या हुआ ये शाहिद कौन है ?


ये सारे सवाल मेरे अंदर के पत्थर हो चुके इंसान को झकझोर रहे थे और मैं  अब भी निशब्द चुपचाप खड़ा था | तभी डिब्बे में रोज तरह शम्मी नारंग जी  की आवाज गूंजी ..


यह मालवीय नगर स्टेशन है और मैं इन सब सवालो को धकियाते हुए स्टेशन पर  उतर गया |

बेपरबाह दौड़ता , मशीनी सीढ़ी से चढ़ता हुआ इस शहर की रिवाजो और भीड़ में शामिल हो गया ....

(निशांत यादव )
                                                                      

                                                                  

Thursday, 16 October 2014

गुलों में रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले --(A Connection between old and new generation by Vishal Bhardwaj's Haider)


जब कोई नयी पीढ़ी का कलाकार  पुरानी पीढ़ी के कलाकार की  रचना को अपनी कला में इस्तेमाल करता है तब वह सिर्फ उसके इस्तेमाल ही नहीं वल्कि उसे नयी पीढ़ी के श्रोता से भी रूबरू करा रहा होता है और ये होते रहना चाहिए ताकि वो पुरानी नज्मे जो किताबो के पन्नो में दबी रह गई है वो हम नयी पीढ़ी के लोगो को तरोतर करती रहें , और हम भी उन नज्मकारो को याद रखें और जब भी हम ये नज्मे सुने हमे फक्र होता रहे , बस इतना ध्यान रखे कि इन लाजबाब नज्मो का इस्तेमाल सही जगह करे क्योकि जब तक वो नज्मे उस जगह प्रायोगिक नहीं होगी तब तक नयी पीढ़ी का श्रोता उसका मोल नहीं जानेगा , मेने विशाल भारद्वाज की हैदर देखी , जो फिल्म बो बनाते हैं उसका तो को सानी ही नहीं है लेकिन मेरे हिसाब से हैदर उनकी फिल्म में एक नगीना सा है इस फिल्म में जितने कलाकार है शाहिद कपूर , तब्बू , के. के. मेनन सब में लाजबाब अभिनय किया है लेकिन इसमें तारीफ विशाल भारद्वाज की है उन्होंने पूरी फिल्म में कहानी को जिन्दा कर दिया है मुझे ये फिल्म अब तक सबसे उत्कृष्ट फिल्मे में से लगी , और सबसे बड़ा आकर्षण मुझे इसका  रहा फैज़ अहमद फैज़ की साहव ये गजल ......

गुलों में रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का करोबार चले
क़फ़स उदास है यारो, सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले
कभी तो सुब्ह तेरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्क-ए-बार चले
बड़ा है दर्द का रिश्ता, ये दिल ग़रीब सही
तुम्हारे नाम पे आयेंगे ग़मगुसार चले
जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब -ए-हिज्राँ
हमारे अश्क तेरी आक़बत सँवार चले
हुज़ोओर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूँ की तलब
गिरह में लेके गरेबाँ का तार तार चले
मक़ाम 'फैज़' कोई राह में जचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले

मेने ये ग़ज़ल हैदर देखने के बाद कई बार सुनी है , इस फिल्म में तो इसे अर्जित सिंह ने गाया है , लेकिन आप इसे मेहंदी हसन साहव के अबाज में सुनिए , यकीं मानिये अगर आप को नज्मो की क़द्र है तो आप इसे सुनकर तरोतर हो जायेगे .


Wednesday, 17 September 2014

अधूरा गीत - A Incomplete Song with Out You





तुम्हारे लिए गीत हूँ लिख रहा !                                                              
हर सजर लिख रहा हर पहर लिख रहा !                                                  
शब्द गूंथे हैं माला में मैंने यहाँ !
गीत का राग छेड़ा है मैंने यहाँ !
आ भी जाओ, ऐ हमसफ़र मेरे !
ये गीत अब अधूरा तुम्हारे बिना !
शाम की महफिले हैं अधूरी यहाँ !
चाँद की चांदनी है अधूरी यहाँ !
रात के इस अँधेरे में बुझ रही है शमां !
रास्ता भी यहाँ खोया खोया सा है !                                                                  
आ भी जाओ मुझे रौशनी चाहिए
है सफर ये अधूरा तुम्हारे बिना!                                                                            
शब्द रूठे हुए नज्म रूठी सी है !
पृष्ठ भीगा हुआ आसुओं से मेरे !
राग बेचैन है सुर भी बिगड़ा हुआ !
गीत है अब असंभव तुम्हारे बिना !
अवतलक क्यूँ कफा हो बताओ जरा !
शख्स बदला है मैंने तुम्हारे लिए !
लौट आने की चाहत में जिन्दा हूँ में !
गीत गाने की चाहत में जिन्दा हूँ में !
गीत है अधूरा अधरों के बिना !
मैं तुम्हारे लिए गीत हूँ लिख रहा !
हर सजर लिख रहा , हर पहर लिख रहा !
                                                                            
      ......निशांत यादव .....