Friday, 25 April 2014

कुछ अलग-थलग सी है ये पक्तियां | ध्यान से देखोगे तो जुडी नजर आएगी

कुछ अलग-थलग सी है ये पक्तियां | ध्यान से देखोगे तो जुडी नजर आएगी | जोड़ी इसलिए नहीं क्यों कि कुछ मित्रो की शिकायत है कि रचनाओ में काव्यात्मकता की कमी है अब काव्यात्मकता के चक्कर में अहसास लिखना कैसे छोड़ दूँ | नया प्रयोग किया है अच्छा लगे तो बताइयेगा _______________________________________________
रिश्तो के खेत में मुह्हबत की फसल उगाई
मगर कम्बक्त ये नफरत बथुए की तरह उग आई
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में मुह्हबत बाटता हूँ तुम नफरत बांटो
फिर देखो इस जहाँ को हम कहाँ लिए जाते हैं
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में फूल बोता हूँ तुम कांटे बोओ !
फिर देखो इस जहाँ को हम कहाँ लिए जाते हैं
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तुम मुझ पर कीचड़ उछालो में तुम पर फूल उछलता हूँ
फिर देखो इस जहाँ को हम कहाँ लिए जाते हैं
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नफरत कौन याद रखता है मुह्हबत बांटो
फिर देखो इस जहाँ को हम कहाँ लिए जाते हैं
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....निशांत यादव .....

Tuesday, 1 April 2014

मेरा गाँव अब शहर हो गया है

मेरा गाँव अब शहर हो गया है
अब ये मकानों का शहर हो गया है !
ढूँढता हूँ जब कहीं सरसों के फूल खेतो में
लगता है कि जैसे कोई कहर हो गया है !
ये सच है कि अब मेरा बैंक में खाता खुल गया है
मगर अब लाला की दुकान पर ये खाता बंद हो गया है !
अविरल बहती नदी अब नाला हो गया है
इसका पानी अब काला हो गया है !
माँ के हाथो का वो सुबह का ताजा मट्ठा
अब मदर डेरी का छाछ हो गया !
बाबूजी का हुक्का अब होटल की रातो की शान हो गया है
कुएं का पानी अब बिसलरी की दुकान हो गया है !
वासमती चावल और घी की खुशबू ना जाने कहाँ गायब हो गई
इनकी पहचान अब १०० रूपये और ६०० रूपये हो गई !
बैंक में नोट और जेब में वोट तो है हमारी
पर अब भी इन खुशियों में खोट है हमारी!
हाँ ये सच है हमने प्रगति कमाई है
पर हमने प्रक्रति की गोद गबाई है !
शब्दों में खुशी और दर्द दोनों है
क्या करें ये सर्द आखें दोनों है !
हमने पाया है कुछ खो कर बहुत
हाँ ये सच है सबकुछ ! सबकुछ !
......निशान्त यादव .........